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Voter Mata Kee Jai ! (वोटर माता की जय !)

by Pratistha Singh (प्रतिष्ठा सिंह )

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  • ISBN: 9789350728475
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Fiction
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2017
  • Pages: 188
  • Original Price:Rs. 195.00
  • Language: Hindi
सदियों से समूचे भारत के अखण्ड रूप-स्वरूप को एक नारी का समरूप माना गया है। मातृभूमि जो कि जननी है, मातृभूमि जो पालन करती है और पालन-पोषण के साथ-साथ स्नेह भी देती है। दुनिया में बहुत-सी ऐसी भाषाएँ हैं जिनमें आपको 'मातृभूमि' शब्द नहीं मिलेगा। वहाँ इसे 'पितृभूमि' कहा जाता है। भारत यदि पिता है तो उसकी भी जय होनी चाहिए, लेकिन जो भी हमारी माता है, उसका अकारण ही तिरस्कार तो नहीं होना चाहिए। आदर तो उनका भी होना चाहिए न जो निःसन्तान हैं? या अविवाहित हैं? विधवा है? बदसूरत है? बाँझ हैं? केवल इसलिए उनका निरादर हो कि वे महिलाएँ हैं? मगर क्या ऐसा होता है? क्या जयकारा भर लगा देने से भारत के प्रति या भारत की माताओं के प्रति हमारी जो जिम्मेदारियाँ हैं, वे पूरी हो जाती हैं? क्या यह नारेबाजी बेमानी नहीं है? यह नारेबाजी आपत्तिजनक नहीं, किन्तु बेमानी जरूर है। सरहद पर बैठे हर सिपाही के बलिदान को बारम्बार सलाम करते समय कहीं हम ये तो नहीं भूल गये कि एक माँ, एक पत्नी और एक बेटी ने भी उसके पीछे अपना-अपना बलिदान किया है? सेना का हर जवान यह जानता है कि देश की रक्षा करना उसका धर्म है और वह यह भी नहीं भूलता कि यही उसकी नौकरी है, रोजी रोटी है। देश के गाँवों में जाकर किसानों से बात करके देखिए। आपको संघर्ष और बलिदान की ऐसी मिसालें मिलेंगी कि उनके प्रति आपकी सम्मान भावना चौगुनी हो जायेगी। ... ये किसान केवल पुरुष ही नहीं हैं। इनमें अनगिनत महिलाएँ भी हैं जो हमारी या आपकी तरह फेमिनिज्म की जानकार नहीं हैं, लेकिन खुद में उसकी जीती-जागती मिसाल हैं। यह किताब ऐसी ही असंख्य महान महिलाओं की एक पूरी अज्ञात दुनिया को आप तक पहुँचाने का एक प्रयास है। चुनाव उनके लिए क्या मायने रखते हैं-यह समझाया तो जा सकता है लेकिन इसे समझा तभी जा सकेगा जब आप उनके सुख-दुख के भागीदार होंगे। बात जरा टेढ़ी लगेगी, लेकिन 'कौन हमारा विधायक होगा और कौन मुख्यमन्त्री बनेगा से उनके जीवन पर सीधा असर पड़ता है। शहर में रहने वालों पर उतना असर तो शायद अमरीकी चुनावों का भी न पड़ता हो... लेकिन यह तो बिहार का चुनाव है... यदि आप महिला वोटरों की जागरूकता देखना चाहते हैं तो उसका सर्वोत्तम उदाहरण छोटे-छोटे शहरों एवं गाँवों में पायेंगे। बिहार न तो कोई छोटा प्रान्त है और न ही ऐसा कि इसमें केवल गाँव ही गाँव हो। यह बहुत बड़ा राज्य है और शहरों से भी भरा-पूरा है। लेकिन यहाँ की महिलाओं की जागरूकता क़ाबिलेतारीफ है। यहाँ की महिला वोटर चुनाव को लेकर इतनी उद्यत (एक्साइटेड) होंगी, यह हमने सोचा ही नहीं था। भारतीय राजनीतिक कर्मभूमि को यदि शोध की दृष्टि से देखा जाये तो पायेंगे कि हर एक राज्य में कई चकित करने वाली असामान्यताएँ हैं। बात चाहे बंगाल के रसगुल्ला पसन्द करने वाले इंटेलेक्चुअल की हो या दिल्ली की खांसी से ग्रस्त इंडिया गेट प्रेमी वोटर की, बम्बई के सेल्फी खींचने की ललक से प्रेरित वोटर हों या बिहार के 'ऐही जमनवे वा बबुआ' कहकर उम्मीदवारों से निराश वोटर... ये सब और हम सब राजनीति को अपने स्तर से समझते व ऑकते हैं। चाहे देश का हर कोना व्हाट्सऐप पर घड़ाघड़ फारवर्ड होने वाले झूठे सन्देशों से ग्रस्त क्यों न हो, मतदान आज भी एक पेचीदा मुद्दा है। और निःसन्देह होना भी चाहिए। बिहार में हमने ये देखा कि राजनीति में पुरुष वर्ग की रुचि भले ही सदियों से स्वाभाविक मानी जाती रही हो, आज के बिहार में महिला वर्ग का स्वभाव बन चुका है कि इन रूढ़िवादी बेड़ियों को तोड़कर राजनीति को अपनी रुचि के अनुसार कर लें। ऐसे में ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि महिलाओं की यह रुचि पुरुषों के बनिस्पत भौतिक रूप से जीवन-यापन की गुत्थियों से अत्यन्त गहरे स्तर पर जुड़ी है और शायद (महिला मुक्तिकरण की साक्षात् उपस्थिति में) आनेवाली कई सदियों तक जुड़ी रहेगी।

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