Vismriti Ke Baad (विस्मृति के बाद)
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- ISBN: 9789352292684
- Binding: Hardcover
- BISAC Subject(s): Hindi
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2015
- Pages: 290
- Original Price:Rs. 175.00
- Language: Hindi
"यह निबन्ध समसामयिक भारत में साहित्यालोचना के बारे में है। आज भारतीय आलोचना के संकट के बारे में आम सहमति है, यह निबन्ध उसे ऐतिहासिक सन्दर्भों में व्याख्यायित करने की कोशिश है। इसका मकसद मौजूदा फैशनवाले सैद्धान्तिक दृष्टिकोणों का विश्लेषण करना नहीं है। मेरा मानना है कि समसामयिक भारतीय साहित्य के सन्दर्भ में नये और अर्थपूर्ण सैद्धान्तिक प्रकृति के प्रश्नों को सूत्रबद्ध करना तब तक सम्भव नहीं होगा, जब तक कि इस क्षेत्र के ऐतिहासिक मानक तय न कर लिये जायें। साहित्य और साहित्यालोचना के बारे में आत्मसजग दृष्टिकोण, देशी परम्पराओं की बेहतर समझदारी और उनके आधुनिक परिवर्तनों के बारे में सही अन्तर्दृष्टि होना साहित्यालोचना के काम और व्यवहार के बारे में संगत और उपयोगी बहस की शुरुआत करने की पूर्वशर्त है। यह दृष्टिकोण भारतीय आलोचकों को सैद्धान्तिक सूत्र प्रस्तावित करने में मददगार होगा।
अभी ऐसा माना जाता है कि परम्परागत आलोचना को आधुनिक पाश्चात्य आलोचना ने पूरी तरह विस्थापित कर दिया और इसे भारतीय साहित्य और सौन्दर्यबोध की नयी धारा के रूप में मान्यता प्राप्त है। लेकिन क्या पूर्ववर्ती धारा ने अपने पीछे कोई ऐसा तन्तु नहीं छोड़ा जिसने नयी धारा में कुछ बदलाव किये हों? इसके अलावा क्या केवल एक मुख्यधारा थी या फिर वह अनेक सह-धाराओं से मिलकर बनी थी जो आज ओझल हो गयी हैं? क्या स्थानीय का अपर-देशीय द्वारा विस्थापन सामान्य और एकीकृत परिघटना थी? ऐसे सवाल सन्तोषजनक उत्तर की प्रतीक्षा में हैं। लेकिन भारतीय आलोचना के संकट की वास्तविक प्रकृति को समझने के लिए एक इससे भी महत्वपूर्ण सवाल पर विचार करने की जरूरत है। इस सवाल का सम्बन्ध न तो काव्यशास्त्र की संस्कृत परम्परा से है और न ही पाश्चात्य साहित्य विचार से। इसका सम्बन्ध आधुनिक भारतीय भाषाओं से है या यदि परम्परागत भारतीय शब्द इस्तेमाल करें तो भाषाओं से है।"
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