Vishwabahu Parashuram (विश्वबाहु परशुराम)

Vishwabahu Parashuram (विश्वबाहु परशुराम)

by Dr. Vishwambhar Nath Upadhyaya (डॉ. विश्वम्भर नाथ उपाध्याय)

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  • ISBN: 9788170555148
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Dalit studies
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2025
  • Pages: 280
  • Original Price:Rs. 695.00
  • Language: Hindi
आर्यों के पौराणिक काल विभाजन में हासवादी दृष्टि है, सत्युग में धर्म की पूर्ण विद्यमानता, पुनः त्रेता में ह्रास, द्वापर में उससे अधिक पतन और कलियुग में महापतन। पुराणकारों का ध्यान मेरी दृष्टि से इस बात पर रहा है कि 'सत्युग' में ऋषि-मुनि या धर्मज्ञों की चलती थी, महत्त्व मनुष्य की मेधा, सृजन, ज्ञान-विज्ञान और लोकोत्तर अन्तर्दृष्टियों का था, बाद के युग में त्रेता और द्वापर में महत्त्व शासकवर्ग का बढ़ गया और कलियुग में यन्त्र तथा धन का, पूँजी का। इस काल विभाजन में द्रष्टव्य यह है कि पौराणिकों ने युग-विभाजन में, मानव धर्म या मूल्यों को आधार बनाया है और जहाँ तक एक यूथ या क़बीले में मानवीयता यानी समता, बन्धुत्व और स्वतन्त्रता का प्रश्न है, वह प्रारम्भिक समाजों या आदिमकालीन क़बीलों में निश्चय ही था किन्तु परम्परावादी, सत्युग के आदर्शीकरण की अति में यह भूल जाते हैं कि क़बीलों में आपस में ही समता थी, सभी के साथ नहीं। क़बीलों की टकराहटें सत्युग का कठोर तथ्य था और उसमें क्रूरता अपरिहार्य थी। सत्युग में आर्यों में भी आपसी युद्ध भी हुए जैसे दशराजयुद्ध और वे मिलकर भी दुष्ट शासकों से लड़े, आर्य-अनार्य संघर्ष भी हुए, होते रहे और राम जैसे ऋषियों के प्रयत्नों से आर्य-अनार्यगण मिलकर भी सामान्य शत्रुओं से भिड़े, यह भी इतिहास का तथ्य है पर पौराणिक इस प्रकार सत्युग का वर्णन करते हैं जैसे उस युग में धर्म या मानवता पूर्णतः स्थापित थी और आनन्द, सद्भाव और समता आदि से चैन की वंशी बजती रहती थी। अतएव एक विशिष्ट ऐतिहासिक काल में रचित वैदिक कविता तथा परवर्ती पुराणादि में जो मानवसत्य या मूल्य मिलते हैं, उनका सामान्यीकरण कर आधुनिक युग में उन्हें सार्वभौमिकता दी जा सकती है। इस उपन्यास में यह भी प्रयत्न किया गया है। गंगा का प्रवाह भगवान परशुराम का गत्यात्मक मानस है जो सोचता हुआ बह रहा है और जिसकी कोई थाह नहीं है... किनारे से छप्-छप् करतीं लघु वीचियाँ तट से बतियाती भी हैं और उसकी जड़ता पर उसे तमचियाती भी हैं... वृक्ष इस कौतुक पर प्रसन्न होकर वायु के झकोरों में रत्नों की भाँति पत्तियाँ, फल, फूल, गिरा रहे हैं, और 'साधु ' ' साधु' कह रहे हैं... वातावरण में ब्रह्मा कविता घोल रहा है... और ऐसा अर्थ भर रहा है जिसे मन अनुभव तो करता है कि कुछ है पर क्या है, यह बोध में आता नहीं है ... एक अस्फुटता है सृष्टि में... सविता किरणों की अँगुलियों से उस तात्पर्य को टटोलता है और न मिलने पर ताप बढ़ाकर उस प्रयोजन को पिघलाने में लगा है...यह सब जो हो रहा है, होता रहता है, वह, प्रातः-सन्ध्या, रात-दिन, निरन्तर होता रहता है, वह गंगा की बालू पर चलती वायु के खेल की भाँति है जो रेत पर लकीरें खींचता है, एक ज्यॉमिति बनती है और विद्यालय के बालक की स्लेट पर लिखे व्याकरण-सी मिट जाती है, और पुनः हवा बालुका पर बारहखड़ी लिखने लगती है।

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