Vayu Purush (वायु पुरुष )
Ships in 1-2 Days
Choose a Book cover type:
Secure Payment Methods at Checkout
- ISBN: 9789387919303
- Binding: Hardcover
- Subject: Poetry
- BISAC Subject(s): Sahitya
- Publisher: Bharatiya Jnanpith
- Publisher Imprint: Vani
- Publication Date: NA
- Release Year: 2019
- Pages: 128
- Original Price:Rs. 250.00
- Language: Hindi
वायुपुरुष -
वायुपुराण में उनचास मरुतों का उल्लेख है। मरुतों को मरुत् होने का वर मिला तथा पिता के वाक्य से उनका देवता होना और वायु के कन्धे पर रहना बताया गया है। "मरुत्प्रसादी मरुतां दित्यादेवाश्च संभवाः। कीर्त्यन्ते चाथ गणास्ते सप्तसप्तकाः । देवत्वं पितृवाक्येन (ण) वायु स्कन्धेन चाश्रमः।" (वायुपुराण, 134)
वायु के अनेक पर्याय प्राच्य ग्रन्थों में प्राप्त होते हैं और सभी पर्यायों की अपनी महत्ता और व्यवस्था भी उल्लिखित है। इन सबके विभिन्न स्वरूपों के बावजूद जो एक स्थायी और सभी स्वरूपों को सामान्य गुणधर्मिता प्राप्त होती है, वह है—गति, पराक्रम, विद्या और प्राण तत्त्व के रूप में स्पष्ट पहचान। भृगु कहते हैं (184.4) — प्राणियों का शरीर पंच महाभूतों का ही संघात है। इसमें जो चेष्टा या गति है, वह वायु का भाग है जो खोखलापन है, वह आकाश का अंश है; ऊष्मा (गर्मी) अग्नि का अंश है: लोह आदि तरल पदार्थ जल के अंश हैं। भृगु स्पष्ट कहते हैं कि सारा स्थावर जंगम संसार पंचभूतों से ही युक्त है। सारा संसार ऊर्जा से संचालित है, ऊर्जा का नाम प्राण है। कठोपनिषद् में कहा गया है— यदिदं किंचजगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम्— यह जो मारा जगत दिखाई देता है, यह प्राण के स्पन्दन से निकला है (पृ. 140) "पुरुष जो प्राणन करता है (मुख या नासिका द्वारा वायु को बाहर निकालता है) वह प्राण है" (पृ. 43 )। यजुर्वेद में 'अग्ने आयुरसि'— यानी अग्नि तू आयु है (5/2) कहा गया है। यहाँ आयु पुराणों में उर्वशी और पुरुरवा का पुत्र माना गया है। ऊपर कही गयी बातों के परिप्रेक्ष्य से कवि उपेन्द्र कुमार 'वायुपुरुष' का विस्तार रचते हैं। पंचभूतों में से एक तत्त्व 'वायु' को अपने प्रबन्ध-काव्य का मुख्य नायक बनाते हैं और उसकी यति-गति के साथ उनका कविमन बह चलता है। किन्तु इस बहने में वे कोरी काल्पनिकता का सहारा नहीं लेते बल्कि भारतीय और विदेशी मिथकों का पाठ-पुनःपाठ करते हुए एक नायक 'चरित्र' का निर्माण करने का प्रयास करते हैं, जो व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप में इस सृष्टि में विद्यमान है। अनेक मिथकों का एक सम्यक् चरित वायुपुरुष।
इस प्रबन्ध काव्य में कवि विभिन्न कथाओं-पुराकथाओं से हमारी यात्रा को उस समकालीन वैश्विक संकट और चुनौती के सामने ला खड़ा करता है जो प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण और पारिस्थितिकी के क्षय से जुड़ा है और जो समस्त सृष्टि के प्राण का संकट बन गया है। जिसका कारण कोई और नहीं, हम ही हैं।
संसार के मंगल की कामना करता यह प्रबन्ध काव्य सहृदय पाठकों को पसन्द आयेगा, ऐसी आशा है।
Author information not available.
Trusted for over 24 years
Family Owned Company
Secure Payment
All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted
New & Authentic Products
India's Largest Distributor
Need Support?
Whatsapp Us
Bestselling
View All
₹178
₹200
(-
11
%)
₹623
₹700
(-
11
%)
₹456
₹495
(-
7
%)
₹1602
₹1800
(-
11
%)
₹428
₹480
(-
10
%)
₹979
₹1100
(-
11
%)
₹1335
₹1500
(-
11
%)
₹557
₹625
(-
10
%)
₹579
₹650
(-
10
%)
₹579
₹650
(-
10
%)
₹890
₹1000
(-
11
%)
₹445
₹500
(-
11
%)