Use Yaad Karte Huye (उसे याद करते हुए )
Ships in 1-2 Days
Choose a Book cover type:
Secure Payment Methods at Checkout
- ISBN: 9788119014781
- Binding: Hardcover
- Subject: Poetry Collection
- BISAC Subject(s): Sahitya
- Publisher: Bharatiya Jnanpith
- Publisher Imprint: Vani
- Publication Date: NA
- Release Year: 2023
- Pages: 122
- Original Price:Rs. 295.00
- Language: Hindi
उसे याद करते हुए -
हर कवि चाहे वह कितना क्रान्तिकारी क्यों न हो, उसकी कविता के केन्द्र में प्रेम का निवास होता है। सृष्टि के लय, छन्द की तरह उसकी कविता जीवन के लय छन्द को पकड़ती और सहेजती है। प्रेम का अनुभव एक अनुष्ठान की तरह उसकी कविताओं की मनोभूमि में विन्यस्त होता है। नरेश अग्रवाल का यह कविता संग्रह उसे याद करते हुए प्रेम की इसी प्रतीति पर आधारित है जिसमें वे कहीं इस नतीजे पर पहुँचते है हृदय जब प्रेम के द्वार पर दस्तक देता है तो मन किसी खंजन की तरह मधुर कलरव में खो जाता है, वह जैसे संसर्ग के हर सर्ग की परिक्रमा का पुण्यफल अर्जित करता है, कुदरत की निर्वसन किन्तु अनिन्द्य आत्मा में बीज बनकर समाने की इच्छा लिए हुए बार-बार लौटने की कामना से प्रतिश्रुत होता है।
नरेश अग्रवाल की ये कविताएँ जैसे नाप-जोखकर रची गयी हों, एक अनुभव, एक संवेदन, एक क्षण, एक कौंध, एक दृष्टि जैसे उसकी अनुभूतियों को कविता में बदल देती है। उनकी कविताएँ क्षेत्रफल मंत जगह कम घेरती है, आत्मा में किसी सूक्त की मन्त्रविद्ध गरिमा के साथ बजती है और प्रेम तो बाहरी सारे कोलाहल को अनसुना कर अपने ही राग में उपनिबद्ध हो उठता है। पूरी सृष्टि जैसे उसका मनुहार कर रही होती है।
एक कविता में वे कहते हैं, "अंगूर और अंजीर के फल/उगते हैं तुम्हारे शरीर से/पकते हैं, गिरते हैं, मेरी झोली में/फिर से नये आते हैं/यही प्यार देने का तरीक़ा है तुम्हारा/तुम्हें पर्वत की ढलान समझता हूँ/ बिना माँगे लुढ़ककर/ये स्वतः चले आते हैं" हाँलाकि यह बहुत स्थूल तरीक़ा है प्रेम के प्रतिफल को सामने रखने का किन्तु यह अनुभूति हर बार पुनर्नवा होकर हृदय में उतरती है। कभी फूल, कभी पत्ती कभी फल बनकर और कभी इस अहसास के साथ कि जैसे न त्वहं कामये राज्यं! बकौल कवि, "छोड़ कर इन सारी चीज़ों को मैं झाँकता हूँ तुम्हारी आँखों में/न इसमें मकबरा देखता हूँ न ही महल/मुग्ध होता हूँ तुम्हारे सौन्दर्य पर।"
इन कविताओं में अपार संसार में बहुत सी पुनरावृत्तियाँ हैं जो कि प्रेम में स्वाभाविक हैं और जो स्वाभाविक है वही कवि को काम्य है। यहाँ प्रतीक्षाएँ हैं, विरह है, अदेखापन है, उदासी है पर सब कुछ प्रेम के आईने में झिलमिल करता हुआ। साधारण से दिखते वाक्यों में प्रेम का व्याकरण बेहद सधा हुआ है, कविता के ढीले तारों पर अपनी तरह से झंकार उठाता हुआ बिम्ब-प्रतीकों और अलंकारों से बहुत लदी-फँदी न होकर अपनी सहजता में कुछ छू लेने जैसा भाव सहेजे नरेश अग्रवाल की कविताएँ प्रणय की भूलभुलैया में खोई नागरिक चेतना को मार्ग दिखाती हैं, इसमें सन्देह नहीं।
प्रेम कविताओं के अध्ययन में इन कविताओं की भी अपनी भूमिका होगी, इसमें संशय नहीं।—ओम निश्चल
Author information not available.
Trusted for over 24 years
Family Owned Company
Secure Payment
All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted
New & Authentic Products
India's Largest Distributor
Need Support?
Whatsapp Us
Bestselling
View All
₹178
₹200
(-
11
%)
₹623
₹700
(-
11
%)
₹456
₹495
(-
7
%)
₹1602
₹1800
(-
11
%)
₹428
₹480
(-
10
%)
₹979
₹1100
(-
11
%)
₹1335
₹1500
(-
11
%)
₹557
₹625
(-
10
%)
₹579
₹650
(-
10
%)
₹579
₹650
(-
10
%)
₹890
₹1000
(-
11
%)
₹445
₹500
(-
11
%)