Shaitaan Ki Aulaad (शैतान की औलाद)
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- ISBN: 9788181439499
- Binding: Hardcover
- BISAC Subject(s): Science
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2009
- Pages: 165
- Original Price:Rs. 325.00
- Language: Hindi
"आज के 'उत्तराधुनिकोत्तर' दौर में उपन्यासों की वर्णन शैली और प्रयोगधर्मिता पाठकों को चकित नहीं करती। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिस समय 'शैतान की औलाद' प्रकाशित हुआ तब मनुष्य के चेतना प्रवाह से मेल खानेवाली भाषा और पात्रों के खयालों के माध्यम से कथा को गति प्रदान करने की शैली से पाठक परिचित नहीं थे।
विषय वस्तु और शिल्प की दृष्टि से 'नालुककेट्टु ' और 'कालम' से श्रेष्ठ माने जानेवाले 'शैतान की औलाद' का नायक गोविन्दन कुट्टि है। हालाँकि एम. टी. के नायकों के सम्बन्ध में आमतौर पर कहा जा सकता है कि वे आधी रात की ख़ामोशी में ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर धीमी गति से रेंगनेवाली बैलगाड़ी की जिन्दगी जीनेवाले लोग हैं, 'शैतान की औलाद' के गोविन्दन कुट्टि के सम्बन्ध में यह सबसे ज़्यादा सार्थक है, क्योंकि गोविन्दन कुट्टि की जिन्दगी, जैसा कि लेखक नरेन्द्र प्रसाद मानते हैं, 'दुखों का आरोह है'। मगर ऐसा क्यों है? इस सवाल का कोई जवाब नहीं।
दार्शनिक उपन्यास की संकल्पना एम. टी. के मन में नहीं है, लेकिन अनुभवों को दर्शन के रूप में परिवर्तित करनेवाला एक रसायन विज्ञान अथवा अनुभवों और दर्शन को अभिन्न कर देनेवाली एक जैविकता एम. टी. के लेखन में है। इस तरह एम. टी. का उपन्यास जीवन-सन्दर्भों की असंगतियों से रिस आते संघर्षों का संग्रह बन जाता है। दुख के अलावा राग, विराग, प्रतिशोध और सहिष्णुता का सम्मिश्रण उपन्यास का मुख्य रस बन जाता है। मनुष्य के अपने बस में न रहनेवाले जीवन प्रसंगों से अपनी चुनी हुई प्रवृत्तियों की अघोषित जंग उपन्यास की अन्तर्धारा बन जाती है।
गोविन्द कुट्टि तो बचपन से अपने जन्म के बारे में इल्ज़ाम सुन कर पला। औरों की वजह से अपने खेत और खेती के कामों से उसे हाथ धोना पड़ा। अपने अमीर जीजा के खेत का कारिन्दा बनना पड़ा। उसके सुझाव पर उसकी मर्जी से शादी करके धोखा खा कर उसका दुश्मन बननेवाले गोविन्दन कुट्टि ने इस्लाम धर्म को स्वीकार किया। आखिरकार धर्म-परिवर्तन की निरर्थकता समझ कर पुतुक्कोट चुम्मुक्कुट्टि अम्मा नामक बदनाम औरत के घर में छिप कर रहते समय यह हर पल डर के साथ उस औरत की जबान से एक सवाल का इन्तजार करता था कि 'तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?' जाहिर है, यह दर्दनाक सवाल स्वयं गोविन्दन कुट्टि के अन्दर का सवाल है।
'कालम' का सेतु अपना शहरी जीवन समाप्त करके गाँव में लौट आने के बाद मन्दिर में जा कर प्रार्थना करता है- 'मुझे और एक मौका दो।' काल को पीछे ले जा कर सब कुछ अथ से आरम्भ करने की नामुमकिन कामना। ऐसे हृदयविदारक विलाप हम गोविन्दन कुट्टि से सुन सकते हैं। बेशक। यह पढ़ कर किसी-किसी को सन्देह हो सकता है कि उपन्यास को अतिशय भौतिकता के स्तर तक खींच ले जाने की कोशिश की जी रही है। लेकिन नहीं। एम. टी. के साहित्य के अनुभव के दर्शन को परखते समय दिखाई देनेवाली चन्द बातों की ओर संकेत करने मात्र की यह कोशिश है। एम. टी. के साहित्य में व्यक्तियों का वेबस होकर ज़िन्दगी की विसंगतियों से समझौता कर लेना और काल की लहरों में लक्ष्यहीन बह जाना उनकी व्यक्तिनिष्ठ या आत्मनिष्ठ पुकारे जाने योग्य रवैये का नतीजा है।
1962 में 'शैतान की औलाद' के प्रथम प्रकाशन के बाद उसकी भाषा, कथावस्तु आदि अलग-अलग पहलुओं
को लेकर अनेक अध्ययन निकल चुके हैं। हाल ही में डॉ. एम. लीलावती की 'असुरवित्तु एक अध्ययन' नामक एक किताब भी प्रकाशित हुई है। इसलिये लम्बे विवरण और विश्लेषण की कोई प्रासंगिकता नहीं। फिर भी जैसा कि इस लेख के आरंभ में संकेत दिया गया है उपन्यास की समकालीनता के कुछ पहलुओं को दिखाना उचित होगा।
इससे यह भी मालूम पड़ जाएगा कि उपन्यास को वर्तमान से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले इसके वैयक्तिक और सामाजिक पहलू एक-दूसरे के पूरक हैं।"
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