Shahr Mein Gaon (शहर में गाँव)

Shahr Mein Gaon (शहर में गाँव)

by Nida Fazli (निदा फ़ाज़ली)

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  • ISBN: 9789350728857
  • Binding: Paperback
  • BISAC Subject(s): Novel
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2018
  • Pages: 628
  • Original Price:Rs. 375.00
  • Language: Hindi
निदा फ़ाजली चलती फिरती लेकिन लम्हा-ब-लम्हा बदलती ज़िन्दगी के शायर हैं। उनका कलाम मेहज़ ख़याल आराई या किताबी फलसफा तराज़ी नहीं है। वजूदी मुफ़िक्कर व अदीब कामियो ने कहा है। मेरे आगे न चलो, मैं तुम्हारी पैरवी नहीं कर सकता। मेरे पीछे न चलो मैं रहनुमाई नहीं कर सकता। मेरे साथ चलो... दोस्त की तरह। कामियो की ये बात निदा के अदबी रवैये पर सादिक़ आती है। उनकी शायरी क़ारी असास शायरी है। इसमें बहुत जल्द दोस्त बन जाने की सलाहियत है। इसमें नासेहाना बुलन्द आहंगी है, न बाग़ियाना तेवर हैं। उन्होंने लफ़्ज़ों के ज़रिये जो दुनिया बसाई है वो सीधी या यक रुख़ी नहीं है। उसके कई चेहरे हैं। ये कहीं मुस्कुराती है कहीं झल्लाती है। कहीं परिन्दा बन के चहचहाती है और कहीं बच्चा बन के मुस्कुराती है। उन्हीं के साथ जंग की तबाहकारी भी है। सियासत की अय्यारी भी है। इन सारे मनाज़िर को उन्होंने हमदर्दाना आँखों से देखा है और दोस्त की तरह बयान किया है। निदा की तख़लीक़ी ज़ेहानत की एक और ख़ुसूसियत की तरफ़ इशारा करना भी ज़रूरी है। इंसान और फ़ितरत के अदम तवाज़ुन को जो आज आलमी तशवीशनाक मसला है निदा ने निहायत दर्दमन्दी के साथ मौज़ू-ए-सुख़न बनाया है। जिस दौर में बढ़ती हुई आबादी के रद्दे अमल में, बस्तियों से परिन्दे रुख़्सत हो रहे हों, जंगलों से पेड़ और जानवर गशयब हो रहे हैं, समुन्दरों को पीछे हटाकर इमारतें बनाई जा रही हों। उस दौर में फ़ितरत की मासूम फिज़ाइयत और उसकी शनाख़्त के आहिस्ता आहिस्ता ख़त्म होने की अफ़सुर्दगी ने इनकी इंफ़ेरादियत में एक और नेहज का इज़ाफा किया है। सुना है अपने गाँव में रहा न अब वो नीम, जिसके आगे माँद थे सारे वैद हकीम।

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