Sahitya ka Itihas - Darshan (साहित्य का इतिहास-दर्शन )
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- ISBN: 9789349585560
- Binding: Hardcover
- BISAC Subject(s): Reference
- Publisher: Nine Books
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2025
- Pages: 348
- Original Price:Rs. 795.00
- Language: English
साहित्य का इतिहास-दर्शन' में नलिन जी, साहित्येतिहास के परंपरा निर्धारण में भारतीय बनाम पाश्चात्य परंपराओं का विशद् विवेचन करते हैं और यह दिखाते हैं कि भारत में साहित्येतिहास की परंपरा पहले से विद्यमान रही है। कथा (आख्यान) और इतिहास के संबंध से वे प्राचीन भारतीय कथा परंपराओं में पालि, प्राकृत और अपभ्रंश में पाई जाने वाली कथाओं की वाचिक परंपरा के सहारे साहित्येतिहास की परंपरा को रेखांकित करते हैं। इस संबंध में वे जैनाचार्य जिनसेन, प्राकृत के उद्योतन सूरि, अपभ्रंश के पुष्पदंत आदि का उल्लेख करते हैं। नलिन जी विचार-दृष्टियों के आधार पर साहित्य की परम्पराओं का वर्गीकरण करते हुए पाँच धाराओं- भौतिकवाद, यथार्थता (यथार्थवाद), मानववाद, मानवतावाद और धार्मिकता - का उल्लेख करते हैं । उनके अनुसार “आधुनिक हिन्दी साहित्य को ये पाँच सदानीरा धाराएँ सिंचित कर रही हैं।” साहित्य में टी. एस. इलियट के विचार-दर्शन को मानने और महत्व देने वाले नलिन जी भौतिकवाद, यथार्थवाद, मानववाद, मानवतावाद जैसी धाराओं का उल्लेख करने के साथ ही 'धार्मिकता' को पाँचवीं धारा के रूप में रखते हैं। यह संभवतः हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन में एक नयी धारा की पहचान कराना और उसके महत्व पर बल देना है । पर, इस धारा के भविष्य को लेकर नलिन जी आश्वस्ति ज़ाहिर नहीं करते ।
हिन्दी आलोचना में नलिन जी रूपवादी आलोचक के बतौर पहचाने जाते हैं,परंतु उनकी दृष्टि कलावादी मात्र नहीं है। एक नहीं, अनेक जगहों पर वे साहित्य और कलाओं के विकास में उपस्थित बदलावों को ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की बात करते हैं। 'साहित्य का इतिहास - दर्शन' में एक महत्वपूर्ण अध्याय है 'साहित्यिक इतिहास के शेष पक्ष'। इस अध्याय की शुरुआत में ही वह कहते हैं कि 'साहित्यिक परिवर्तनों को उनके ऐतिहासिक तथा समाजशास्त्रीय परिवेश में रखकर समझने की कोशिश की जानी चाहिए।' इसी अध्याय में आचार्य नलिन विलोचन शर्मा साहित्येतिहास लेखन में लोकवार्ताओं, लोकगीतों, किंवदंतियों, वाचिक/मौखिक परम्पराओं आदि का उपयोग करने और उन्हें इतिहास - लेखन में सम्मिलित किए जाने का प्रस्ताव रखते हैं। आगे चलकर महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा ने एक परियोजना के तहत चार खंडों में 'हिन्दी साहित्य का मौखिक इतिहास' का प्रकाशन किया। एक चीज और जो नोटिस करने योग्य है, संभवतः नलिन जी वह पहले साहित्याचार्य हैं जिन्होंने 'महान', 'प्रमुख' और 'विशिष्ट' रचनाकारों की जगह साहित्येतिहास में 'गौण' अथवा उपेक्षित लेखकों/रचनाकारों को महत्व दिये जाने की बात कही है। स्पष्ट तौर पर उनका कहना है कि हिन्दी साहित्य में इन 'महान गौणों' कि उपेक्षा हुई है और इसका कारण है, शोध ने अपने वास्तविक कर्तव्य का पालन नहीं किया। देखने वाली बात यह है कि तब तक इतिहास के नए स्कूल 'सबाल्टर्न स्कूल' का जिक्र हिन्दी में नहीं मिलता है।
अतः नलिन जी की इस पुस्तक 'साहित्य का इतिहास-दर्शन' का ऐतिहासिक महत्व है। हिन्दी में अपने तरह की यह इकलौती पुस्तक है। शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए बहुत दिनों से यह पुस्तक अनुपलब्ध थी । नयी किताब प्रकाशन समूह के मालिक अतुल माहेश्वरी के प्रयास से, अविकल इसे नयी साज-सज्जा के साथ प्रकाशित होता देखकर ख़ुशी हो रही है ।
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