Ram : Janat Tumhahi Tumhai hoi jai (राम : जानत तुम्हहि तुम्हाइ होइ जाई )
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- ISBN: 9789362876102
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Philosophy
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2024
- Pages: 328
- Original Price:Rs. 625.00
- Language: Hindi
राम भारतीय चेतना की प्राणवायु हैं। युग-युगान्तर से मानव सभ्यता जिन मानवीय मूल्यों को अपने भीतर सँजोते और आत्मसात करती आयी है, राम उन मूल्यों के साक्षात् प्रतिरूप हैं। वर्तमान भौतिक युग और सामाजिक विघटन के दौर में जिस तरह से मानवीय सम्बन्ध क्षीण हो रहे हैं, ऐसे में राम का उदात्त चरित्र प्रेरणादायी और मन में उत्साह जगाने वाला दिखाई पड़ता है। राम का चरित्र एक तरफ़ करुणा सम्पन्न है तो दूसरी तरफ़ वीर और पराक्रमी भी। संसार जब आतंकवाद की विभीषिका झेल रहा है, ऐसे में भी श्रीराम का यह रूप पूरे संसार को एक वैश्विक सन्देश देता है। ऐसे सर्वप्रिय व सार्वजनीन चरित्र श्रीराम का प्राचीन ऋषि-मुनियों, भक्तों-सन्तों और कवियों आदि ने तो महिमामण्डन किया ही, आधुनिक काल में विभिन्न मनीषी और चिन्तक जैसे विवेकानन्द, महर्षि अरविन्दो, बाल गंगाधर तिलक, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी, विनोबा भावे और राम मनोहर लोहिया आदि भी राम चरित्र से बहुत प्रभावित थे, और उन्होंने राम को अपने लेखन का विषय बनाया। प्रस्तुत पुस्तक इक्कीसवीं सदी में राम को नयी दृष्टि से देखने का एक विनम्र प्रयास है।
—इसी पुस्तक से
★★★
यह पुस्तक एक ऐसी प्रेरणा की स्रोतस्विनी है, जिसमें विगाहन करके कोटि-कोटि मानवों के मानस निर्मल होते रहेंगे; ऐसा मेरा निरत्यय प्रत्यय है। मेरी मंगलाशंसा है कि इसी प्रकार निरंजन, निरंजन परब्रह्म भगवान राम की सेवा करते रहें।
—जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज
★★★
यह पुस्तक भारतीय जनमानस को रामकथा एवं श्रीराम के जीवन चरित्र के अनेक पक्षों से अवगत करायेगी। श्रीराम की कृपा से जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम को भारत की प्रत्येक झोपड़ी, महल तथा जन-गण-मन में पहुँचा दिया, यह पुस्तक उसी कार्य को और आगे बढ़ायेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
—योगेश सिंह,
कुलपति, दिल्ली विश्वविद्यालय
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यह एक पुस्तक ही नहीं बल्कि श्रीराम जी के चरित्र का बहुआयामी प्रतिबिम्ब है। इस रामचरित-सिन्धु में प्रत्येक मानव गोता लगाकर अपने अनुरूप मनोवांछित ज्ञान-रत्न प्राप्त कर सकता है।
—पद्मभूषण कपिल कपूर,
सुप्रसिद्ध भाषाविज्ञानी एवं भारतीय ज्ञान परम्परा विशेषज्ञ
★★★
रमन्ते यस्मिन् इति रामः अर्थात्, जिसमें रम जाया जाये, वही राम हैं। रामकथा असीम, अनन्त, आदर्श, आस्था और अधिष्ठान है। यह पुस्तक रामकथा के इन्हीं गुणों को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर उन्हें लोकमंगल हेतु प्रयासरत रहने के लिए प्रेरित करती है।
—किशोर मकवाना,
अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, भारत
★★★
भगवान राम सर्वोत्तम भारतीय मूल्यों और धार्मिक दर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं। राम को समझना एक व्यक्ति के माध्यम से भारत को समझना है। यह पुस्तक हमारी प्राचीन ज्ञान परम्परा, विशेषकर रामकथा में निहित ज्ञान-विज्ञान को सरल और सामयिक सन्दर्भों में समाज के सामने लाने का महनीय कार्य करती है।
—संजय प्रताप सिंह,
एम.डी., एफ. ए. ए.एन., एफ. ए. एन. ए.
अध्यक्ष, एलिना हेल्थ न्यूरोसाइंस, स्पाइन एंड पेन इंस्टीट्यूट, यू. एस. ए.
★★★
रामकथा और रामराज्य की संकल्पना अनादि काल से भारतीय सभ्यता का आदर्श सन्दर्भ बिन्दु रही है। राम को अनेक महान विभूतियों ने कालानुरूप परिभाषित करने का प्रयास किया है। यह पुस्तक उन्हीं सब भावों को एक साथ प्रस्तुत करती है।
—प्रफुल्ल केतकर,
प्रसिद्ध पत्रकार एवं विचारक
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