Pramanu Kraar Ke Khatre Urja Ke Bahane Samprabhuta Ka Sauda (परमाणु करार के ख़तरे उर्जा के बहाने सम्प्रभुता का सौदा)

Pramanu Kraar Ke Khatre Urja Ke Bahane Samprabhuta Ka Sauda (परमाणु करार के ख़तरे उर्जा के बहाने सम्प्रभुता का सौदा)

by Edited by Mahasweta Devi & Arun Kumar Tripathi (सम्पादक - महाश्वेता देवी, अरुण कुमार त्रिपाठी)

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  • ISBN: 9788181438959
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Novel
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2008
  • Pages: 72
  • Original Price:Rs. 200.00
  • Language: Hindi
नाभिकीय करार कर यूपीए सरकार और विपक्षी दलों के बीच खींचातानी और जोड़-तोड़ की आतुरता और वामपन्थियों के विरोध ने कम-से-कम इतना तो साफ़ कर ही दिया है कि यह मुद्दा जितना संवेदनशील है, उतना ही जटिल भी। ऊपर से, इस परिदृश्य पर अमरीका के राष्ट्रपति पद के चुनावों की मँडराती हुई छाया और भारतीय संसद के आगामी चुनावों के नजदीक आते जाने की भी अपनी भूमिका है। फिलहाल इन नाटकीय दाँवपेचों से अलग मामला भारत के अमेरिका करण और अमेरिका की साम्राज्यवादी इच्छा को मंजूरी देने और उसके विरोध का है। यह बात अब शीशे की तरह साफ है कि इस समझौते का परमाणु ईंधन या ऊर्जा जरूरत से कोई ख़ास लेना-देना नहीं है। दरअसल पंडित जवारह लाल नेहरू ने जिस तरह से भाग्य वधू से भारत को आजाद कराने की एक प्रतिज्ञा की थी और उसे 15 अगस्त, 1947 को पूरा किया, उसी तरह मनमोहन सिंह और उनके पीछे खड़े भारतीय मध्यवर्ग ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को भारत के अमेरिकी करण का एक वचन दिया था और उसे वे हर कीमत पर 28 में पूरा करके मानेंगे। भारतीय राजनीति में शायद उसे रोक पाने की सामर्थ्य नहीं दिखती। वामपंथी दलों ने अपनी संसदीय ताकत के बूते पर जितना विरोध करना था किया। अब यह मामला भारतीय जनता के हाथों में है कि वह अपनी आन्दोलन की विराट शक्ति और मताधिकार के प्रयोग से इस प्रक्रिया को कहाँ तक रोक सकती है। यह संकलन उसी उद्देश्य के लिए चेतना को जगाने का एक प्रयास और साम्राज्यवाद का विरोध करने वाली ताकतों को एकजुट करने का एक आह्वान है। और इसीलिए इन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस अंक में नाभिकीय ऊर्जा की साम्राज्यवादी राजनीति, उसके आर्थिक और वैज्ञानिक पक्षों पर विस्तार से चर्चा की गयी है। यह पुस्तक हिन्दी पाठकों की तथ्यों और विश्लेषण की बौद्धिक भूख को लेकर तैयार की गयी है, क्योंकि उसके तथाकथित मित्र के रूप में तेजी से बढ़ रहा प्रिंट या इलैक्ट्रॉनिक मीडिया उसे इन गम्भीर और बेहद जरूरी मुद्दों की जानकारी देने से ही परहेज करता है तो विश्लेषण की बात ही दूर है।

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