Mugdhbodh Hindi Vyakaran (मुग्धबोध हिन्दी व्याकरण )
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- ISBN: 9789350002148
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Fiction & Fiction
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2010
- Pages: 104
- Original Price:Rs. 395.00
- Language: Hindi
"भाषा का साधु अर्थात् परिनिष्ठित रूप ही व्यापक हो राष्ट्रभाषा का स्थान प्राप्त कर लेता है। राष्ट्रभाषा सदा भाषा का मानक रूप होती है। वह एक भी हो सकती है और एक से अधिक भी। आधुनिक भारतीय भाषाओं में असमी, बांग्ला, मराठी, पंजाबी, तमिल, तेलुगु आदि कुल अट्ठारह भाषाएँ अपने मानक रूप में राष्ट्रभाषाएँ मानी गयी हैं जिनमें एक हिन्दी भी है।
सामान्यतः राष्ट्रभाषा ही राजभाषा होती है, पर जिस राष्ट्र में कई राष्ट्र भाषाएँ होती हैं, वहाँ व्यावहारिक सुविधा हेतु उनमें से किसी एक को उसकी व्यापकता, सर्वाधिक विस्तृत क्षेत्र में विचार-विनिमय का साधन रूप में प्रयोग, अन्य भाषाभाषियों को उसे सीखने की सहजता और सरलता आदि को ध्यान में रख कर राजभाषा स्वीकार कर लिया जाता है। भारतीय राष्ट्रभाषाओं में हिन्दी अन्य भाषाओं के सीमित क्षेत्रों को लाँघ कर अधिक व्यापक एवं विस्तृत क्षेत्र में विचार-विनिमय का साधन और भावात्मक एकता में सहायक होने के कारण राष्ट्रीय नेताओं द्वारा भारत सरकार की राजभाषा स्वीकार की गयी है।
भाषा नदी की धारा की तरह सतत् प्रवहमान बनी रहती है। यह उसका स्वभाव या गुण है। भाषा रुकना नहीं जानती। उसके प्रवाह को रोकने या बाँधने का प्रयत्न किये जाने पर वह बन्धन को तोड़ कर निकल जाती है। देश-विदेश की हर भाषा में यह प्रवृत्ति दिखायी पड़ती है।"
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