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Mein Jo Hoon, 'Jon Elia' Hoon (मैं जो हूँ 'जॉन एलिया' हूँ )

by Jon Elia, Edited by Dr. Kumar Vishwas (जॉन एलिया, सम्पादन : डॉ. कुमार विश्वास )

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  • ISBN: 9789350728833
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Hindi
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2024
  • Pages: 86
  • Original Price:Rs. 299.00
  • Language: Hindi
मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ जनाब इसका बेहद लिहाज़ कीजिएगा। ये जो जॉन एलिया के कहने की ख़ुद्दारी है कि मैं एक अलग फ्रेम का कवि हूँ, यह परम्परागत शायरी में बहुत कम ही देखने को मिलती है। जैसे— साल हा साल और इक लम्हा, कोई भी तो न इनमें बल आया ख़ुद ही इक दर पे मैंने दस्तक दी, ख़ुद ही लड़का सा मैं निकल आया जॉन से पहले कहन का ये तरीक़ा नहीं देखा गया था। जॉन एक ख़ूबसूरत जंगल हैं, जिसमें झरबेरियाँ हैं, काँटे हैं, उगती हुई बेतरतीब झाड़ियाँ हैं, खिलते हुए बनफूल हैं, बड़े-बड़े देवदारु हैं, शीशम हैं, चारों तरफ़ कूदते हुए हिरन हैं, कहीं शेर भी हैं, मगरमच्छ भी हैं। उनकी तुलना में आप यह कह सकते हैं कि बाक़ी सब शायर एक उपवन हैं, जिनमें सलीक़े से बनी हुई और क़रीने से सजी हुई क्यारियाँ हैं, इसलिए जॉन की शायरी में प्रवेश करना ख़तरनाक भी है। लेकिन अगर आप थोड़े-से एडवेंचरस हैं और आप फ्लेम से बाहर आकर सब कुछ करना चाहते हैं तो जॉन की दुनिया आपके लिए है। जॉन आपको दो तरह से मिलते हैं। एक दर्शन में और एक प्रदर्शन में। प्रदर्शन का जॉन वह है जो आप आमतौर पर किसी भी मंच से पढ़ें तो श्रोताओं में ख़ूब कोलाहल मचता है। दर्शन का जॉन वो है जो आप चुनिन्दा मंचों पर पढ़ सकते हैं और वे शे'र ऐसे होते हैं जिन्हें श्रोता अपने साथ अपने घर ले जा सकते हैं। जहाँ मजमा हो, वहाँ प्रदर्शन सुनाइए और जहाँ महफ़िल हो, वहाँ दर्शन सुनाइए। जैसे दर्शन का शे'र देखें- निकल आया मैं अपने अन्दर से अब कोई डर नहीं है बाहर से अब जो डर है मुझे, तो इसका है अन्दर आ जाएँगे मेरे अन्दर से जॉन जहाँ पहुँच गये हैं, उसकी ख़बर उन्हें खुद भी नहीं है। वे स्वयं को कई बार फँसा हुआ महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि वे गलत वक़्त में पैदा हुए हैं। उन्हें इस बात का एहसास है कि वो जितनी आज़ादी से अपनी बात कहना चाह रहे हैं, वैसे कह नहीं पा रहे और यदि कह भी पा रहे हैं तो लोग उस तरह से समझ नहीं पा रहे। कुल मिलाकर ज़िन्दगी के हर उतार-चढ़ाव को न सिर्फ़ शायरी में ढालना, बल्कि उसको एंजॉय करना और श्रोताओं-पाठकों से एंजॉय करवाना-ये जॉन होते हैं। तो जॉन को पढ़ें, जॉन को जियें और एक बिल्कुल नयी दुनिया में विचरण कर के आयें। यक़ीनन जब आप बाहर आयेंगे तो जॉन आपकी सोच का स्थायी हिस्सा हो चुके होंगे।

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