Loktantra Ka Naya Lok Chunavi Rajniti Mein Rajyon Ka Ubhar  (2 Volume Set) (लोकतन्त्र का नया लोक चुनावी राजनीति में राज्यों का उपहार (2 वॉल्यूम सेट))

Loktantra Ka Naya Lok Chunavi Rajniti Mein Rajyon Ka Ubhar (2 Volume Set) (लोकतन्त्र का नया लोक चुनावी राजनीति में राज्यों का उपहार (2 वॉल्यूम सेट))

by Edited By Arvind Mohan (सम्पादक : अरविन्द मोहन)

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  • ISBN: 9789350000274
  • Binding: Paperback
  • BISAC Subject(s): Medical
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2009
  • Pages: 16
  • Original Price:Rs. 3,000.00
  • Language: Hindi
लोकतन्त्र का नया लोक - भाग- 1-2 - बीते दो दशकों में राजनीति पूरी तरह बदल गयी है। इन बदलावों में सबसे बड़ा है राष्ट्रीय राजनीति की जगह राज्यों की राजनीति की प्रधानता। इस बदलाव का ही परिणाम है कि राष्ट्रीय राजनीति का मतलब राज्यों का कुल योगफल ही है। आज गठबन्धन सच्चाई है और विविधता भरे भारतीय समाज और लोकतन्त्र से इसका बहुत अच्छा मेल हो गया है। राजनीति में बदलाव लाने वाले तीन मुद्दों-मण्डल, मन्दिर और उदारीकरण - ने इसमें भूमिका निभायी है। हर राज्य की राजनीति, ख़ासकर चुनावी मुकाबले का स्वरूप तय करने में इन तीनों का असर अलग-अलग रूप और स्तर का हुआ है। इसी चलते कहीं एक दल या गठबन्धन का प्रभुत्व है तो कहीं दो-ध्रुवीय, तीन-ध्रुवीय या बहु-ध्रुवीय मुकाबले शुरू हुए हैं। विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) अपने लोकनीति कार्यक्रम के ज़रिये चुनावी राजनीति और लोकतन्त्र के अध्ययन का काम करता आया है। आम लोगों और अकादमिक जगत में इसके अध्ययनों और सर्वेक्षणों का काफी सम्मान है। प्रस्तुत पुस्तक चुनावी सर्वेक्षणों और अध्ययनों के राज्यवार संयोजकों, विशेषज्ञों और जानकर लोगों के आलेखों का संग्रह है जिसमें सीएसडीएस के अध्ययनों के आधार राज्य के सामाजिक, आर्थिक और विभिन्न समूहों की चुनावी पसन्द से लेकर मुद्दों, नेताओं और पार्टियों के बदलावों को देखने दिखाने की कोशिश की गयी है। राज्यों की राजनीति पर केन्द्रित और देश के हर राज्य से सम्बन्धित ऐसा अध्ययन और ऐसी किताब अभी सम्भवतः किसी भाषा में नहीं है। किताब पूरे देश, हर राज्य के बदलावों, प्रवृतियों को बताने के साथ ही लोकतन्त्र और भारत के लिए इनके प्रभावों और अर्थों को समझने-समझाने का काम भी करती है। अन्तिम पृष्ठ आवरण - बीते साठ वर्षों में हमारा लोकतन्त्र भी काफ़ी बदला है, बल्कि यह कहें कि जवान हुआ है। इसके बदलावों में कुछ ऋणात्मक प्रवृत्तियाँ भी हैं, पर ज़्यादातर बदलाव सार्थक और धनात्मक है। जब दुनिया भर में लोकतन्त्र का जोर बढ़ा है तब भी स्थापित लोकतान्त्रिक शासनों में लोगों की दिलचस्पी घटी है—ख़ासकर कमज़ोर और अनपढ़ लोगों में। पर भारत में उल्टा हुआ है यहाँ न सिर्फ़ मतदान का प्रतिशत बढ़ा है बल्कि इसमें कमज़ोर समूहों का प्रतिशत और ज़्यादा बढ़ा है। इनमें लोकतन्त्र के प्रति उत्साह और भरोसा बढ़ा है। जिस जम्मू-कश्मीर में सारी सुरक्षा के बावजूद किसी नेता को आम सभा करने की हिम्मत नहीं हो रही है वहां के मतदान के प्रतिशत ने हर किसी को चौंका दिया। जो लड़के सुबह वोट का नारा लगाते थे वही शाम तक स्वयं बदल जाते थे और बूथ पर मतदाताओं की लाइन में खड़े होते थे। और अकेले एक चुनाव ने कई मसलों का हल कर दिया।

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