Khwabon Kee Hanshi (ख्वाबों की हँसी )
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- ISBN: 9789350728789
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Sahitya
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2016
- Pages: 176
- Original Price:Rs. 195.00
- Language: Hindi
"सन् 22 में जब हरिओम की ग़ज़लों की पहली किताब 'धूप का परचम' आयी तो हिन्दी-उर्दू जबान की सियासी, गैर वाज़िब बहसों के बाहर जाकर ग़ज़ल प्रेमियों ने उसे खूब सराहा-ख़ासकर ग़ज़लों के मजमून और बात कहने के तेवर को लेकर। तमाम समीक्षकों ने उस किताब पर दुष्यन्त कुमार का असर देखा । स्वयं शायर को भी इस बात से इनकार नहीं है और वह मानता है कि हिन्दी ग़ज़लों में दुष्यन्त कुमार एक मेयार हैं। इलाहाबाद में रहते हुए वहाँ की रचनात्मक विरासत का एक हिस्सा जाने-अनजाने उसके भीतर भी उतर आया है और इस विरासत में दुष्यन्त तो हैं ही, इलाहाबाद की संवेदनात्मक और वैचारिक परम्परा भी है।
'धूप का परचम' के तकरीबन पन्द्रह बरस बाद ग़ज़लों की यह दूसरी किताब 'ख़्वाबों की हँसी' पाठकों के सामने है। ‘ख़्वाबों की हँसी' में संवेदन और विचार के स्तर पर वैसा उतावलापन और आवेग नहीं है जैसा कि पहलेसंग्रह में था । यहाँ शायरी में थोड़ा ठहराव, संजीदगी, सब्र और सादगी दिखेगी। हालाँकि इस बीच हरिओम ग़ज़लोंके अलावा लगातार कहानियाँ और कविताएँ लिखते रहे लेकिन ग़ज़लें उनके तसव्वुर के दायरे से कभी बाहर नहीं जा सकीं। उसकी एक वजह यह भी थी कि उनके भीतर एक गायक, और वह भी ग़ज़ल गायक, ग़ज़लों-नज़्मों और शे'रो-शायरी की हमारी परम्परा से गहरी वाबस्तगी बनाये हुए था ।
शायरी में चन्द लफ़्ज़ों में असरदार बात कहने की ताकत तो है ही, साथ ही मौसीक़ी से उसका रिश्ता उसे और मुफ़ीद बना देता है। 'ख़्वाबों की हँसी' में उनकी कुछ ताज़ी नज़्में भी शामिल की गयी हैं । उनमें भी आपको एक लयकारी दिखेगी। वे अपनी कविताओं में भी एक लय बरतने की कोशिश करते हैं और मानते हैं कि कविता कितनी भी छन्द मुक्त हो जाय, यह लयकारी ही उसे गद्य बनने से रोकती है। इस लय को कविता की संरचना से अलगाया नहीं जा सकता ।"
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