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Khato-Kitabat : Gyanranjan - Karmendu Shishir (ख़तों किताबत : ज्ञानरंजन - कर्मेन्दु शिशिर )

by Edited and Compiled by Manohar Billaure (सम्पादन - संचयन मनोहर बिल्लौरे )

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  • ISBN: 9789373488516
  • Binding: Paperback
  • BISAC Subject(s): Science
  • Publisher: Vani Prakashan(Navodaya Sales)
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2026
  • Pages: 16
  • Original Price:Rs. 795.00
  • Language: Hindi
ज्ञान-शिशिर उर्फ़ ज्ञानरंजन और कर्मेन्दु शिशिर के ख़तो- किताबत की यह महत्त्वपूर्ण किताब ‘पत्र संवाद’ और ‘पत्र संवाद कला’ का पारदर्शी आईना है। हिन्दी साहित्य में यह सुदीर्घ परम्परा है। यह कृति उसकी एक उज्ज्वल कड़ी है। किताब में इतिहास और संस्कृति के अक़्स हैं। साथ ही दो लेखकों के स्वभाव, सरोकार, राग, खुली मनःस्थिति, समय के चिन्ता-चित्र और विवादों पर उन्मुक्त रायशुमारी दृष्टव्य है। दो अदीब जब संवाद में होते हैं तो यह जुगलबन्दी वाचिक के अलावा लिखित होती है। लिखा गया शब्द इतिहास में दर्ज होता है। वाचिक का संवाद विलुप्त हो जाता है। आत्मीय और मुक्त संवाद का माध्यम है पत्र-साहित्य। इसमें बिना लाग-लपेट के प्रकृत शिल्प में सत्य अभिव्यक्त होता है। नाटकीयता और पूर्वग्रह से मुक्त ऐसा लेखन अधिक विश्वसनीय होता है, जो यहाँ है। अपवादों को छोड़कर यह साहित्य, कालजयी होने के सफ़र पर भासमान दिखाई देता है। उदाहरण के लिए पत्र साहित्य के इतिहास में जगह बना चुके जो नाम स्मरण आते हैं उनमें भारतेन्दु, दयानन्द सरस्वती, गांधी, टैगोर, नेहरू, प्रेमचन्द, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रताप नारायण मिश्र, प्रेमघन, ठाकुर जगमोहन सिंह, महादेवी वर्मा, डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल, निराला, रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, यशपाल, बच्चन, अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध, नामवर सिंह, अश्क़, मलयज, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर आदि हैं। ग़ालिब और फ़िराक़ गोरखपुरी की परम्परा में उर्दू के लेखकों का पत्र-साहित्य भी आला दर्ज़े में शुमार है। कह सकते हैं ‘ज्ञान-शिशिर’ का यह संवाद इस परम्परा का एक मानीख़ेज़ अध्याय है जिसमें बीते तीन दशकों का साहित्य समाज केन्द्र में है। वक़्त की तस्वीरें इनमें बरामद होती हैं। जबकि सोशल मीडिया ने पत्र-साहित्य को हाशिये पर डाल दिया है, तब यह किताब तत्कालीन समय के समय, समाज और इतिहास को अपनी तरह से रोशनी में लाती है। –लीलाधर मंडलोई

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