Khagoliya Marichikayen (खगोलीय मरीचिकाएँ)
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- ISBN: 9789352296705
- Binding: Hardcover
- BISAC Subject(s): History
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2017
- Pages: 606
- Original Price:Rs. 300.00
- Language: Hindi
खगोलिकी मनोरंजक ही नहीं, शिक्षाप्रद भी है। यह उन प्रथम विज्ञानों में से एक है, जिनका जन्म मानवजाति के शैशवकाल में ही हो गया था और जो प्रकृति-ज्ञान के मोरचे पर सदा अग्रिम पंक्ति में रही है।
आधुनिक खगोलिकी विशेष तेजी के साथ विकसित हो रही है। रेडियो-टेलीस्कोप से लेकर विभिन्न अंतरिक्षीय उपकरणों जैसे नवीन अन्वीक्षण-साधनों के आविष्कार ने अंतरिक्ष से आने वाली सूचनाओं का प्रवाह तीव्र और विस्तृत कर दिया है और ब्रह्मांड के अध्ययन क्षेत्र में शब्दशः एक के बाद एक नयी खोजें हो रही हैं।
ये खोजें विशेष हितकारी हैं क्योंकि खगोलिकी हमें प्रकृति का मूलभूत ज्ञान देती है, अर्थात् पदार्थ की संरचना और गति की गहनतम और व्यापकतम नियमसंगतियों का उद्घाटन करती है।
लेकिन खगोलिकी विश्व को समझने के लिए हमें आधुनिक वैज्ञानिक अवधारणाओं से लैस ही नहीं करती, वह हमारी परिवेशी प्रकृति को जानने की प्रक्रिया (अभिज्ञान) के द्वंद्ववादी चरित्र को, सापेक्षिक सत्यों से निरपेक्ष सत्यों की ओर गति का एक ज्वलंत उदाहरण भी प्रस्तुत करती है।
लेकिन विज्ञान में कोई भी नयी बात, चाहे वह कितनी भी मौलिक क्यों न हो, अंततः पूर्व ज्ञान के ही आधार पर विकसित होती है। विभिन्न वैज्ञानिक समस्याओं के हल की विधियों में भी कुछ सामान्य बातें होती हैं, यद्यपि हर वैज्ञानिक समस्या अपने-आपमें अद्वितीय होती है।
इसलिए पुस्तक का अधिकांश भाग उन तथ्यों और अवधारणाओं को अर्पित है, जो आधुनिक खगोलिकी की दृष्टि में पर्याप्त विश्वस्त और सुस्थापित माने जाते हैं।
लेकिन साथ ही आधुनिक खगोलिकी में ऐसे भी अनेक प्रश्न हैं, जिनका अब तक कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सका हैं इनसे संबंधित विभिन्न परिकल्पनाओं पर विचार-विमर्श होता रहता है, जो कभी-कभी तो तर्क की सीमाओं से बाहर चली जाती हैं। यह संभव है कि ब्रह्मांड के बारे में हमारे ज्ञान के विकास के साथ-साथ इनमें से कई परिकल्पनाएँ निरर्थक सिद्ध हो जायेंगी। लेकिन परिकल्पनाओं के बिना, अर्थात् ऐसी पैज्ञानिक मान्यताओं के बिना, जो न सही सिद्ध हुई हैं, न गलत ही, खगोलविदों का काम नहीं चल सकता। वह भी ऐसी परिस्थितियों में, जब वह विज्ञान निस्संदेह अभी और भी तेजी से विकसित होगा और उसे नित्य नये तथ्यों पर मनन करना होगा। परिकल्पना प्रकृति-विज्ञान के विकास का आवश्यक रूप है।
इसलिए लेखक को एक ऐसी विधि का सहारा लेना पड़ा है, जो ललित विज्ञान-साहित्य के लिए कुछ असामान्य सी लगती है-विज्ञान-गल्प का आश्रय लेना, जिसका एक बहुमूल्य गुण है विविक्त विचारों को भी मूर्त गुण (सगुणता) प्रदान करना।
विज्ञान-गल्प की सहायता से लेखक ने आधुनिक खगोलिकी की कुछ समस्याओं की ओर पाठकों का विशेष ध्यान आकर्षित करने की, इन समस्याओं को जीवंत और स्पष्ट बनाने की चेष्टा की है, ताकि वे सरल व सुबोध हों।
लेखक आशा करता है कि पाठक उसके विचारों का समर्थन करेंगे।
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