Kavita Ka Parisar Ek Antaryarta (कविता का परिसर एक अंर्तयात्रा)
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- ISBN: 9789350727416
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Fiction & Fiction
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2014
- Pages: 80
- Original Price:Rs. 325.00
- Language: Hindi
कविता अपने पाठकों से बोलना-बतियाना चाहती है, लेकिन हिन्दी में 'आलोचक' नामक प्रजाति ने इस संवाद को असम्भव बना दिया है। आलोचक जब बोलने लगता है तो कविता चुप हो जाती है। जैसे वर्ण-व्यवस्था में व्यक्ति की पहचान का आधार उसकी मानवीय योग्यता नहीं, उसकी जाति होती है, उसी तरह आलोचना के विभिन्न सम्प्रदाय कविता की श्रेष्ठता और सार्थकता का निर्णय, कविता से बाहर अपने बने-बनाये पैमानों के आधार पर करते हैं। शास्त्रवादी आलोचना समय के प्रवाह में अजनबी और अर्थ हो चुकी कसौटियों को मूल्यांकन का आधार बनाती है। मार्क्सवादी आलोचना खाप पंचायत की ही एक साहित्यिक शाखा है। वह मार्क्सवादी फरमानों का विरोध करने वालों को कलावादी, समाज-विरोधी, प्रतिक्रियावादी और अमेरिकापरस्त करार देकर कालापानी की सजा सुनाती है। विमर्शवादी आलोचना की निगाह में हर कविता या तो किसी जाति का प्रतिनिधित्व करती है या लिंग का। यानी रचना सवर्ण होती है, दलित होती है, पुरुष या स्त्री होती है। इन सभी सम्प्रदायों का बल रचना से संवाद पर नहीं, अपने-अपने सिद्धान्तों के प्रचार पर होता है। इनके लिए रचना प्रचार की सामग्री भर है। क्या आलोचना की कोई ऐसी ज़मीन है जहाँ से रचना का पूरा आकाश दिख सके ? यह किताब उसी ज़मीन की तलाश में एक बेहद मामूली, छोटा-सा कदम है।
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