Kante Ki Baat - 7  Andheron Se Uthati Guhaar  (कांटे की बात 7 अँधेरों से उठती गुहार)

Kante Ki Baat - 7 Andheron Se Uthati Guhaar (कांटे की बात 7 अँधेरों से उठती गुहार)

by Rajendra Yadav (राजेन्द्र यादव )

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  • ISBN: 9789350003404
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Reference
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2011
  • Pages: 140
  • Original Price:Rs. 200.00
  • Language: Hindi
"बीसवीं सदी हमारे देखते-देखते मुट्टी में से रेत की तरह फिसल रही है। वही अनसुलझी पहेलियाँ फेंककर चिंता और खेद के विषय छोड़कर। मध्यवर्ग की मरण-कामना ऐसा ही एक मुद्दा है, जो कांटे की बात के इस सातवें खंड का मुख्य विमर्श बिंदु है। स्वतंत्रता के पहले दशक में जो मध्यवर्ग युवा आकांक्षाओं और अनंत संभावनाओं से खलबला रहा था और अपनी उद्दाम ऊर्जा की लक्ष्मी को दृष्टि विहीन भ्रष्ट नेताओं की रूढ़िवद्ध राजनीति में कैद पाकर अँधेरों से गुहार उठा रहा था, वही आज मुझे मेरे खोल में रहने दो का नारा बुलंद कर रहा है। आज वह पितृ-पीढ़ी में तब्दील हो चुका है। उसकी ट्रेजडी यह है कि उसने भ्रष्ट व्यवस्था के साथ सुविधा-समझौतों के बड़े अच्छे समीकरण बिठा लिये हैं। पर अपनी ही बनाई मूर्ति को ध्वस्त कर उपभोक्तावादी युवा पॉप पीढ़ी को जन्म दिया है-अपनी अवैध संतान के रूप में उसी पीढ़ी ने उसे आज निरर्थक और अप्रासंगिक बना दिया है। अचरज की बात तो यह है कि इतनी तूफानी उथल पुथल से गुजरने के बावजूद यह पीढ़ी अब भी पूरी तरफ आत्मलिप्त होकर अपने साहित्य में अपनी ही प्रासंगिकता तलाश रही है। वह भी बाहर के संघर्षों से जुड़कर नहीं बल्कि अध्यात्म और व्यक्तिगत मोक्ष के खोखले प्रयासों में। हिंदी प्रदेशों का वैचारिक संकट यही है कि उसमें बंद दृष्टि से अपना सीमित, संकुचित, व्यक्तिगत सत्य ही लिखा गया है। ईश्वर, स्त्री और समाज इन तीनों के प्रति उसका नजरिया अपरिवर्तनवादी, परंपराबद्ध, प्रश्नहीन समर्थक का रहा है। अभिनिवेशी और उपनिवेशी महानताएँ, पतन की स्वतंत्रता के पचास साल जैसे कई लेख मुख्यधारा के हिंदी साहित्य की इसी जड़ता के सौ वर्षों का इतिहास बताते हैं। समय गुजरने के साथ जो जाने-पहचाने, आत्मीय-अजनबी साथ छोड़ गए हैं, उनके प्रति श्रद्धांजलियाँ हैं स्मृति दंश में।"

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