Kalewala (कालेवाला )
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- ISBN: 9789373480169
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Medical
- Publisher: Vani Prakashan(Lok Mangal Prakashan)
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2025
- Pages: 16
- Original Price:Rs. 3,000.00
- Language: Hindi
कालेवाला' इस दृष्टि से विश्व का एक अद्वितीय महाकाव्य है कि इसके नायक तथा नायिकाएँ, समाज एवं संस्कृति मानवता के विकास के उस मोड़ पर खड़े लगते हैं जहाँ मनुष्य अपनी आदिमता तजता हुआ सभ्यता की ओर अग्रसर होता दिखता है। विश्व के दो महानतम महाकाव्य 'रामायण' तथा 'महाभारत', जिनके सृजन का श्रेय भारतीय प्रतिभा को ही प्राप्त है, 'कालेवाला' की तुलना में अति-संस्कृत, अत्याधुनिक लगते हैं।
फ़िनी जनता की यह महाकविता दरअसल फिनलैन्ड की लोकप्रतिभा की देन है। इसलिए इसमें नगर सभ्यता के तनाव, दबाव, षड्यंत्र तथा राजप्रासादों के हत्याकांड नहीं हैं- मानवीय आस्था को किसी धर्म में नियोजित करने या ब्रह्मांड को लेकर विस्मय तथा आतंक को किसी दर्शन में ढालने के प्रयत्न भी इसमें दिखाई नहीं देते। इसीलिए 'कालेवाला' के अधिकांश कार्यकलाप खुले आकाश के नीचे, मैदानों, चरागाहों, पर्वतों, नदियों और सागर तट या लहरों पर होते हैं।
किन्तु 'कालेवाला' किसी भोली-भाली, अविकसित जाति का महाकाव्य नहीं है। उसे सिरजने वाली प्रतिभा में इतनी प्रखर कल्पनाशीलता थी कि वह एक कवि, गायक, कृषक तथा चमत्कारी व्यक्तित्व को अपना नायक बना सकी और उसे सत्ता तथा सम्पत्ति पर एकाधिकार चाहने वाली अंधकार की शक्तियों के विरुद्ध खड़ा कर सकी। 'कालेवाला' का केन्द्रीय व्यक्तित्व वेइनेमोइनेन और उसका भाई तथा साथी इल्मारिनेन विश्व-महाकाव्यों में किसान तथा लुहार की आदिम एकजुटता के शायद पहले प्रतीक हैं।
भारत में महाकाव्य अब भी करोड़ों लोगों के जीवन में रचे-बसे हैं और अचेतन रूप से उनके परस्पर व्यवहार और व्यापार को प्रभावित करते हैं। इसलिए संभव है कि 'कालेवाला' के भारतीय पाठकों के लिए वे अर्थ हों जो शायद अब उसके देश फ़िनलैन्ड में भी न रह गए हों। कुछ भारतीय तो इसमें अपने महाकाव्यों और पुराणों की कथाओं के समांतर भी खोज लेंगे और कई वर्तमान सामाजिक प्रथाओं और विश्वासों को भी। उससे यही सिद्ध होगा कि हजारों मील दूर, ठिठुरते उत्तर में रचे जाने के बावजूद, उसमें वही मानवीय ऊर्जा तथा ऊष्मा है जो भारतीय महाग्रंथों और जनजीवन में है।
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