Jamia-Beeti (जामिया-बीती )
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- ISBN: 9789369444311
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Textbook
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2025
- Pages: 216
- Original Price:Rs. 295.00
- Language: Hindi
असग़र वजाहत का नाम उन भारतीय लेखकों में शुमार है जिन्होंने अनेक विधाओं में लेखन किया है। ‘जामिया-बीती’ — जामिया मिल्लिया इस्लामिया पर केन्द्रित संस्मरण और इतिहास, उनकी नयी पुस्तक है। यह पुस्तक उनके समय के राष्ट्रीय आन्दोलन, राजनीतिक उथल-पुथल और विभाजन की त्रासदी के बीच मनुष्य के अन्तर्द्वन्दों को एक संस्मरण के रूप में पाठकों के समक्ष रखती है। यह संस्मरणात्मक शैली में उस समय के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में चलने वाली गतिविधियों की एक तस्वीर बनाती है।
महात्मा गांधी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं के सहयोग से बनी इस संस्था का इतिहास बहुत महत्त्वपूर्ण और गौरवशाली रहा है।
असग़र वजाहत के इस संस्मरण में जहाँ एक ओर तत्कालीन जामिया और वहाँ कार्यरत प्रोफेसर मुजीब रिज़वी के साथ उनके सुलझे रिश्तों की दास्तान है, वहीं दूसरी ओर उससे भी कहीं अधिक यह उनकी मित्रता और बड़े फलक पर एक बेहतर से बेहतर होते जाते मनुष्य का चित्र हमारे सामने प्रस्तुत करता है। यह संस्मरण उस शिनाख़्त का एक लेखा-जोखा भी है जिसमें असग़र वजाहत ने राष्ट्रीय आन्दोलन के समय अपने वजूद को महसूस किया।
यह संस्मरण एक लेखक की दृष्टि से, अपने एक सौ वर्ष पूरे कर चुकी संस्था जामिया की राजनीति, उस समय की शिक्षा व्यवस्था और संघर्ष के दिनों को अपने तत्कालीन स्वरूप में दिखाने का प्रयास करता है। बल्कि ऐसा भी माना जाता है कि आज़ादी से पहले जामिया केवल शिक्षा संस्था ही नहीं थी बल्कि एक सामाजिक आन्दोलन था। शिक्षा के अलावा जामिया ने सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप और भागीदारी के उद्देश्य से अध्यापकों और छात्रों की ट्रेनिंग के लिए ऐसे विभाग बनाये थे जिनकी आज भी कल्पना करना कठिन है। लेकिन बाद के दिनों में कट्टरपन्थियों ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया को अपने नियन्त्रण में लेने की कोशिश की जबकि इसकी स्थापना राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित उदार मुसलमानों ने की थी ।
यह वह समय भी हुआ करता था जब असग़र वजाहत जामिया की राजनीति में दिलचस्पी न लेते हुए कनाट प्लेस और कॉफ़ी हाउस में अपना समय बिताया करते थे। वे स्वयं को पूरी तरह से रचनात्मक बनाये रखने का हर सम्भव प्रयास किया करते थे।
अतीत की यह स्मृतियाँ जब एक संस्मरण के रूप में पाठकों के समक्ष आती हैं तो यह एक ऐसी अन्तर्दृष्टि से परिचय कराती हैं जो उस बीते कालखण्ड का भविष्य कहीं न कहीं दर्ज कर ही रही थीं।
वाणी प्रकाशन ग्रुप असग़र वजाहत की पुस्तक ‘जामिया-बीती’ को पाठकों के समक्ष रखते हुए प्रसन्नता अनुभव कर रहा है।
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