Jamaniya Ka Baba (जमानिया का बाबा)
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- ISBN: 9788170551669
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Fiction
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2026
- Pages: 208
- Original Price:Rs. 199.00
- Language: Hindi
मैंने बहुत सोच-समझ कर जमनिया को अपना अड्डा बनाया। पहली बात तो यह थी कि मुझे पिछड़ी जातियों से विशेष प्रेम है। साधुओं का जितना आदर वे करती हैं, उतना और कोई नहीं करता। ऊँची जातियों के बड़े लोग मूर्ख साधुओं का मखौल उड़ाते हैं। भेस और रंग के पीछे वे ज्ञान की परख करते हैं। पक्की भाषा में बड़ी-बड़ी बातें करने वाला साधु ही उन्हें प्रभावित कर सकता है। हमारे जैसों के लिए अनपढ़ भगत ही काम का साबित होता है। जमनिया के इर्द-गिर्द लाखों की तादाद में ग़रीब और अनपढ़ लोग फैले हैं।
दूसरा लाभ था नेपाल का नज़दीक होना। शासन की तीसरी आँख से बचने के लिए न जाने कितनी बार नेपाल भाग-भाग कर गया हूँ। जमनिया की तीसरी खूबी मेरे लिए यह थी कि पुलिस का अड्डा पश्चिम की तरफ 45 मील दूर था और पूरब तरफ नदी के उस पार 12 मील पर। चौथी बात वहाँ यह देखी कि आस-पास कहीं पर स्कूल-कालेज नहीं थे। न किसी के हाथ में कभी कोई अख़बार ही देखा और न किताब ही देखी। और, सबसे बड़ी बात यह थी कि नेता लोग पाँच साल बाद ही दिखाई पड़ते थे। पार्टियों के झण्डे इलेक्शन के ही समय में नज़र आते थे ।
जमनिया की उस ज़िन्दगी से मैं भी तो ऊब चुका था। अक्सर तबीयत बगावत की ओर मचलती थी। मन करता था कि भागकर किसी अनचीन्ही दुनिया में चला जाऊँ, मगर जमनिया में मुझे इस कदर जकड़ रखा गया कि छुटकारा पाना सपना था । मस्तराम, लालता प्रसाद, भगवती, रामजनम, सुखदेव वगैरह मुझे भागने थोड़े देंगे।
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