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Hindi Upanyas : Godan Se Mahabhoj Tak (हिन्दी उपन्यास : गोदान से महाभोज तक )

by Rameshwar Rai (रामेश्वर राय )

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  • ISBN: 9789352290307
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): History
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2024
  • Pages: 650
  • Original Price:Rs. 350.00
  • Language: Hindi
उपन्यास का आगमन उस शून्य को भरने के लिए हुआ जो महाकाव्य के अवसान से पैदा हुआ था । उपन्यास के सामने एक नई दुनिया थी जिसे ईश्वरवादी आस्था और भाग्यवादी विश्वासों से नहीं समझा जा सकता था। तकनीकी विकास और तार्किक विचारों के आघात से समाज का पुराना ढाँचा टूट रहा था और नया जो कुछ बन रहा था उस पर अनिश्चय का कोहरा था । नये मानवीय सम्बन्धों और जीवन-विवेक से उभर रहे प्रश्नों के उत्तर न तो शास्त्र में थे, न ही समाज के पुराने संगठन में । जीवन को रचना में रूपान्तरित करने के लिए उपन्यास के पास कोई बनी-बनाई सैद्धान्तिकी नहीं थी । उसके विषय, रूप और सरोकारों में जो विस्मयकारी विविधता है उसका कारण जीवन के साथ उसका खुला और जीवन्त सम्बन्ध है । एक विधा के रूप में उपन्यास का ढाँचा जब इतना अनिश्चित और गतिमान है तो उसके मूल्यांकन के प्रतिमान स्थिर और फार्मूलाबद्ध कैसे हो सकते हैं? इस किताब में हिन्दी के कुछ कालजयी उपन्यासों का अध्ययन है। कोशिश है कि निष्कर्ष से विश्लेषण करने की बजाय उस जीवन को समझा जाए जो काल्पनिक होते हुए भी उपन्यास के परिसर में सच जैसा है । समाज-विज्ञानों के लिए ग़ैरज़रूरी लेकिन रचना के लिए अनिवार्य प्रसंगों पर मेरी निगाह अधिक टिकी है क्योंकि उन्हीं में वह जीवन है जहाँ मानवीय यथार्थ और उसका भाव-जगत धरती और आकाश की तरह मिलकर नये क्षितिज का निर्माण करते हैं । ★★★ 'गोदान' की महानता औपनिवेशिक भारत के किसानी जीवन के संघर्ष और उसकी त्रासदी, या किसानी संस्कृति के अवसान की महागाथा- दोनों में हो सकती है, लेकिन उसका महत्त्व जीवन के मार्मिक प्रसंगों के चित्रण में ही है जो उसे एक सार्वकालिक रचना बनाती है। उपन्यास के आरम्भ में ही छत्तीस साल की धनिया जब अपनी ढली देह, पके बाल और आँखों की कम होती रोशनी के साथ सामने आती है तो एक झटका-सा लगता बाज़ार की दुनिया में दूधिया गोरेपन के साथ झिलमिलाती स्त्री की परी-देह के जादू को धनिया एक झटके से तोड़ देती है और हम महसूस करते हैं कि इस उपभोक्तावादी तन्त्र का सौन्दर्य, व्यवस्था की क्रूरता के मंच पर खड़ा है।

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