Hindi-Nirukt (हिन्दी-निरुक्त)
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- ISBN: 9788181436535
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Textbook
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2025
- Pages: 156
- Original Price:Rs. 295.00
- Language: Hindi
इस छोटी-सी पुस्तक का यह दूसरा संस्करण बहुत दिन बाद निकल रहा है। प्रथम संस्करण सन् 1949 में कलकत्ते से जनवाणी प्रकाशन ने निकाला था। इस प्रकाशन के अध्यक्ष चि. हजारीलाल शर्मा के विशेष अनुरोध पर ही यह पुस्तक लिखी गई थी और प्रकाशनार्थ दी गई थी। इसका बड़ा आदर हुआ था और महापण्डित राहुल सांकृत्यायन को आशा बंध गई थी कि अब भारतीय भाषा-विज्ञान का उदय होगा। उन्होंने एक लेख भी इस संबंध में लिखकर छपवाया था। उनकी आशा के अनुरूप काम हुआ। इस 'हिन्दी-निरुक्त' के साथ राहुल जी ने 'राष्ट्र भाषा का प्रथम व्याकरण' भी बहुत पसन्द किया था और व्याकरण तथा भाष-विज्ञान पर कुछ अधिक लिखने को प्रेरित किया। फलतः 'हिन्दी शब्दानुशासन' तथा 'भारतीय भाषा विज्ञान' का लेखन-प्रकाशन हुआ। यह काम इसलिए हो गया कि 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' प्रकाशन हुआ। यह काम इसलिए हो गया कि 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' ने व्याकरण लिख देने के लिए मुझसे प्रार्थना की और काशी के ही 'चौखम्भा संस्कृत सीरिज' के प्रकाशकों ने भाषा-विज्ञान लिख देने का आग्रह किया। दोनों जगह से मुझे पेशगी अच्छी रकमें मिलीं, जो आगे चलकर रायल्टी में धीरे-धीरे कट गई। 'हिन्दी शब्दानुशासन' तथा 'भारतीय भाषा विज्ञान' प्रकाशित हो गए। एक पीढ़ी बीत गई।
लोग उत्सुक थे 'राष्ट्र भाषा का प्रथम संस्करण' या 'हिन्दी-निरुक्त' देखने के लिए। परन्तु इनका पुनः प्रकाशन न हो सका। इन दोनों पुस्तकों के प्रकाशक 'जनवाणी प्रकाशन' ने यह काम बन्द कर दिया। मैंने किसी अन्य प्रकाशक से कोई बात न की। लक्ष्मी जी (प्रकाशक) को सरस्वती (लेखक) की सेवा में आना चाहिये; सरस्वती का लक्ष्मी जी के दरबार में हाजिरी देना, ठीक नहीं। यदि लेखकजन प्रकाशक का द्वार खटखटाएँगे, तो उनकी इच्छा का अनुवर्तन करेंगे, तो लोक का अनिष्ट होगा। जहाँ सरस्वती का सम्मान गिबरा कि अन्धकार फैला। यही बात मन में थी कि कभी किसी प्रकाशक से बात नहीं की। आठवें दशक के पूर्वार्द्ध में 'मिनाक्षी प्रकाशन' के व्यवस्थापक दो बार कनखल आए और कुछ देने की प्रार्थना की। मैंने उन्हें अपनी 'अच्छी हिन्दी', 'हिन्दी शब्द मीमांसा' तथा 'राष्ट्र भाषा का प्रथम व्याकरण' प्रकाशनार्थ दे दिया। इन तीनों पुस्तकों का प्रकाशन वहाँ से हुआ; परन्तु 'राष्ट्र भाषा का प्रथम व्याकरण' का नाम बदल कर 'हिन्दी व्याकरण' के नाम से निकाला। अपने असली नाम से निकलता, तो अधिक महत्व रखता।
खैर, अब पिछले दिनों दो बार दिल्ली से 'वाणी प्रकाशन' के व्यवस्थापक चि. अशोक कुमार कनखल आए और कुछ देने को कहा। मैं कुछ नया लिख नहीं सकता। उन्हें यह 'हिन्दी-निरुक्त' प्रकाशनार्थ दे दिया। ऐतिहासिक महत्त्व की चीज है- 'भारतय भाषा विज्ञान' का बीज है, इसलिए माँग थी। माहेश्वरी जी मुझे परिष्कृत विचारों के प्रकाशक जान पड़े। सो, यह छोटी-सी पुस्तक आपके हाथ आ गई है। सबके अच्छे दिन आ सकते हैं।
यह संस्करण ज्यों का त्यों निकल रहा है; न कोई संशोधन, न परिवर्तन, न परिवर्द्धन । विषय का ऐतिहासिक महत्त्व भी है।
- किशोरीदास वाजपेयी
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