Girija (गिरिजा)
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- ISBN: 9789350724842
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Hindi
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2001
- Pages: 280
- Original Price:Rs. 200.00
- Language: Hindi
"शब्दों के सीमित यथार्थ से सुर की महत्तर कारा में जाना, संगीत में अपनी सभ्यता और परंपरा का पुनरान्वेषण करना है। गिरिजा देवी को सुनना और उस सुने हुए को गुनना; हमें अपनी समृद्ध श्रुति परम्परा से सीधे जुड़ने का दुर्लभ अवसर प्रदान करता है। उस परंपरा से, जिसका प्रत्यावर्तन नहीं होता। वह परम्परा, जो भक्तियुग के असंख्य रसिकों के द्वारा स्वतः निःसृत हुई है, दक्षिण के अलवार सन्तों के कारण वहाँ के लोक-जीवन में रची-पगी है, बंगाल के बाउल लोगों की अनन्य श्रद्धा के रूप में दिखाई पड़ती है तथा तमाम संगीत घरानों के माध्यम से आज भी हमें अपनी सांस्कृतिक छवि के प्रति उत्तरदायी बनाए हुए है। इस जोखिम भरे समय में जब हमारी अस्मिता और पारंपरिक इयत्ता पश्चिम प्रेरित होने लगी है, बाजार के कोलाहल. में कहीं दूर चली गई है, यह अत्यन्त सुखद है कि हमारे बीच शब्द और सुर को आश्वस्त करने के उपक्रम में आज भी चंद मूर्धन्य बिना किसी संकोच और निराशा के लगे हुए हैं। कुमार गंधर्व ने कहा था- ""राग तो नंगा होता है, उसे कपड़े हम पहनाते हैं।” अपनी श्रद्धा और समर्पण का वस्त्र । एक गरिमामय आवरण, जो उच्चरित शब्दों से बना हुआ है। गिरिजा देवी भी ऐसे ही जतन में अपने सुर और लय के साथ उपस्थित हैं।
गिरिजा देवी को सुनना सारे संशयों के पार जाना है। अपनी स्वायत्त प्रश्नाकुलता के साथ, ऐसे अनगिनत शाश्वत सूत्रों को पाने जैसा, जिसमें आत्ममुग्धता मिट जाती है और अन्दर तक खुलने का भाव जाग्रत होता है। तब अपने भीतर हम क्षुद्रताओं, शंकाओं और ईर्ष्याओं को छुपा हुआ देख पाते हैं, जिनको बाहर निकाल फेंकना ही सम पर लौटने जैसा होता है। गिरिजा देवी का गान मंगल का गान है। सारी सृष्टि को समेकित भाव से आशीष देने वाला गान, जिसमें स्वयं भी कहीं गहरे अनुगृहीत होने का भाव छुपा हुआ है। उनकी निश्छल सादगी ने एक अद्भुत आभा उनके चारों ओर गढ़ दी है, जो गाते समय पूरी गरिमा के साथ आभासित होती है। संगीत अवरोधों और सीमाओं को तोड़ता हुआ, एक बृहत्तर वृत्त में समाहित होता है और हमें अपने मनुष्य होने का एहसास कराता है। परम्परागत अर्थों में हम जिसे 'उपज की गायकी' कहते हैं, उसमें गिरिजादेवी ने अपनी पद्धति और लोक-व्यवहार का समन्वय कराकर संगीत को नई अर्थ छवियाँ प्रदान की हैं। इस दुनिया में आज भी सुर का बचे रहना उस 'पवित्री' की तरह है, जो दैनिक क्रिया-कलापों में किसी विशेष कार्य को पवित्रता से आरम्भ करने के लिए प्रयुक्त की जाती है। हम आश्वस्त हो सकते हैं कि जब तक ऐसे मूर्धन्यों के स्वर और लय के बीच हम अपनी सामाजिकता को परखते रहेंगे, हमारी सांस्कृतिक चेतना बची रहेगी।
गिरिजा देवी को जितना मैंने जाना और उनसे बनने वाले कलाओं के प्रदीप्त संसार को जाना, आपके सामने है। यह पुस्तक क्रमशः 'गिरिजा-गंगा-काशी', 'लय गुफा में अमर्त्य सुर' तथा 'लोक और शास्त्र का अंतरालाप' शीर्षकों के अंतर्गत विभक्त है। पहला खण्ड संस्मरणात्मक गद्य एवं संगीत व कलाओं पर अंतःप्रक्रियाओं से सम्बन्धित है। दूसरा खण्ड कविताओं पर एकाग्र है। तीसरे खण्ड में गिरिजा देवी से संगीत तथा समाज में रूपंकर अभिव्यक्तियों पर अंतरंग वार्तालाप प्रस्तुत हैं। पिछले तीन वर्षों में कई बैठकों में कभी औपचारिक रूप से तो अकसर अनौपचारिक तरीकों से अलग-अलग जितनी बातें उनसे हुईं, एक साथ इसी खण्ड में संकलित हैं। मैं यह दावा तो हरगिज नहीं कर सकता कि इन बातों से आप उनकी वरेण्य संगीत परम्परा तथा विरासत को पूरा का पूरा जान लेंगे। बहुत कुछ अभी भी ऐसा है, जो छूट गया है। बहुत कुछ छूट जाता भी है। एक कला की, उसके प्रकारान्तर संदर्भों, की तथा उसके सर्जक की यही सफलता भी है कि उसे कभी पूरा का पूरा जाना न जा सके। जितना जान पाऐं हम, उतना ही वह शेष रह जाए। इस कारण यह पुस्तक या इसके समस्त सन्दर्भ एक आरम्भ हैं। एक सांगीतिक उपस्थिति को शब्दों के द्वारा व्याख्यायित करने का एक विनम्र प्रयास। आशा है, इन खण्डों से गुजरते हुए एक कलाकार मन की कुछ स्थाई निर्मितियों एवं महत्वपूर्ण सरोकारों से भी हम टकराऐंगे। शायद इनसे गुजरकर साहित्य और कला जगत के अन्तर्सम्बन्ध को जोड़ने वाली कोई खिड़की हम नए अर्थों में अपने लिए खोल सकें। इस कार्य में समय-समय पर मिले वरिष्ठ रचनाकारों एवं कलाकारों के परामर्श के प्रति कृतज्ञ अनुभव करता हूँ। इनमें प्रमुख रूप से उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ, श्री निर्मल वर्मा, डा. वागीश शुक्ल, सुश्री गगन गिल, श्री मदन सोनी, श्रीमती मालिनी अवस्थी एवं सुश्री सुनंदा शर्मा के प्रति हार्दिक आभारी हूँ जिन्होंने पुस्तक को इस रूप में लाने में मेरा सहयोग किया। इस पुस्तक के कुछ अंश, 'पूर्वग्रह', 'रंग-प्रसंग', 'रंगायन' एवं 'जनसत्ता एक्सप्रेस' में प्रकाशित हुए हैं। इनके सम्पादकों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने इसे प्रकाशित करके मेरा यह विश्वास दृढ़ किया कि बाजार से संचालित होने वाले इस समय में कलाओं के लिए अभी भी जगह बची हुई है।
अंत में, अपनी दादी को याद करना चाहता हूँ जिन्होंने मुझे संगीत के प्रति आस्थावान बनाने में, मुझमें एक अपरोक्ष संस्कार निर्मित किया। संगीत कैसे मनुष्य की संवेदनशीलता को विपरीत परिस्थितियों में सँजोए रखता है, यह मैंने दादी से सीखा। यह पुस्तक उनकी स्मृति को मेरी श्रद्धांजलि है।
"
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