Ghar Ki Baat (घर की बात)
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- ISBN: 9789350727218
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Reference
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2014
- Pages: 32
- Original Price:Rs. 995.00
- Language: Hindi
"आखिरकार, एक आम पाठक किसी दूसरे परिवार का इतिहास जानने के लिए क्यों उत्सुक होगा? इसलिए नहीं, कि यह कोई विशेष परिवार है, इसलिए भी नहीं, कि इसने हिन्दी साहित्य को एक अमूल्य रत्न दिया और पाठक, सम्भवतः, जानना चाहेंगे कि इस लेखक को बड़ा बनाने में उसके परिवेश और परिवार ने क्या भूमिका निभाई ? बल्कि इसलिए, कि यह भारत देश में रहने वाला एक आम परिवार है, यानी भारत में रहने वाले तमाम परिवारों की तरह यह परिवार भी कभी गाँव में रहता था। गाँव में पढ़ाई-लिखाई की समुचित व्यवस्था न होने के कारण इन लोगों को गाँव छोड़कर एक छोटे शहर झाँसी में आकर रहना पड़ा। झाँसी में भी उच्च शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण इन लोगों को प्रदेश की राजधानी लखनऊ जाना पड़ा और अन्ततः तमाम अन्य परिवारों की तरह ये लोग भी एक महानगर में आकर बस गये। इस मायने में यह कहा जा सकता है कि यह एक ऐसा परिवार है जो भारत की तमाम मध्यवर्गीय जनता का प्रतिनिधित्व करता है। इस परिवार ने भी उन तमाम संघर्षो को झेला है और करीब से देखा है जिन्हें आम जनता रोज देखती और झेलती है। फर्क सिर्फ इतना है कि इन लोगों ने परिवार को जनतांत्रिक तरीके से चलाने की कोशिश की है और इस कोशिश के कुछ दस्तावेजों को बचा कर रखा है ताकि उन्हें आने वाली पीढ़ियों के साथ बाँटा जा सके। बहुत से परिवार आगे चलकर बिखर जाते हैं, लेकिन इन लोगों ने कैसे परिवार के मूल्यों को बचाकर रखा और आगे बढ़ने में एक-दूसरे की मदद की, यह देखने और सीखने की चीज है ।
पुस्तक का महत्त्व इसलिए भी है कि कोई भी समाज परिवारों से ही मिलकर बनता है और यह एक परिवार की कहानी होने के नाते कहीं न कहीं समाज की कहानी भी कहती है। इसे पढ़ते समय, कई जगह, पाठकों को लगता है 'अच्छा!! ऐसा तो हमारे परिवार में भी होता है!' क्योंकि सच तो यह है कि ऐसा सभी परिवारों में होता है, लेकिन कुछ लोग उसके बारे में बात नहीं करते, दूसरे कुछ लोग उसकी गम्भीरता को समझ कर उसका हल निकालने की कोशिश करते हैं। यह हल जनतांत्रिक तरीके से सबकी सलाह से भी निकाला जा सकता है या फिर पूँजीवादी तरीके से परिवार के मुखिया की मर्जी को दूसरों पर थोपा भी जा सकता है। दोनों पद्धतियों से चलाये गये परिवारों के दूरगामी परिणाम भी अलग-अलग होते हैं। कई मामलों में परिवार की इकाई की मोहल्ले, गाँव, शहर और देश से भी तुलना की जा सकती है। परिवार की तरक्की और समृद्धि के लिए आवश्यक है कि सबको साथ लेकर चला जाये। और यह काम कैसे किया जाता है, इसमें क्या अड़चन आ सकती है और उन अड़चनों और व्यवधानों को कैसे दूर करना चाहिए, यह भी आप इस पुस्तक से सीख सकते हैं। रामविलास जी यह मानते थे और अक्सर कहते भी थे कि अगर लोग ईमानदार हों और आपसी बोल-चाल और बातचीत बन्द न करें तो दुनिया की कोई भी समस्या ऐसी नहीं है जो मिल-बाँट कर, बोल-बतिया कर, सुलझाई न जा सके। ये बात, जितनी संयुक्त परिवारों पर लागू है उतनी ही समाज की अन्य इकाइयों पर भी। शर्तें दो ही हैं, एक तो नीयत में खोट नहीं होना चाहिए, दूसरे अपनी बात साफ-साफ कहने की हिम्मत होनी चाहिए।
रामविलास जी संयुक्त परिवार को आपसी सहयोग के आधार पर चलाना चाहते थे। ऐसा करने के लिए यह आवश्यक था कि परिवार के लोगों में किसी तरह का मनमुटाव न पनपने पावे। इससे पहले कि यह मनमुटाव एक ग्रंथि का रूप धारण कर ले, इसका निदान कर देना चाहिए। और निदान तभी होगा जब इसका पता चलेगा। इसलिए सबसे जरूरी यह था कि परिवार में वातावरण ऐसा हो कि लोग अपनी बात खुल कर कह सकें। कभी-कभी सामने बात कहने में मुश्किल होती है और अपनी बात लिख कर कहना अपेक्षाकृत सरल होता है। इसलिए सबसे पहले 'शिकायत पुस्तक' या 'सुझाव बुक' की व्यवस्था की गयी ।
आजकल बहुत से लोग स्त्री-विमर्श की बात करते हैं, लेकिन जब अपनी बात आती है तो दोहरा मापदंड अपनाते हैं। कहते हैं कि क्रान्ति अपने घर से शुरू होती है। अपनी पारिवारिक पत्रिका में रामविलास जी द्वारा दिये गये सुझावों को देखें । यह भी ध्यान दें कि ये सुझाव सन् 1944 में दिये गये थे । इस पुस्तक को परिवार के अनेक सदस्यों ने मिलकर लिखा है। ऐसी बेतरतीब सामग्री को कोई शक्ल देना आसान काम नहीं था। यह रामविलास जी का ही 'आइडिया' था कि इसे समय के क्रम के अनुसार सजाया जाये। इस प्रकार सबसे पहले गाँव यानी गाँव पर जो भी सामग्री उपलब्ध थी, उसे पहले अध्याय में रखा गया, उसके बाद, इसी तरह, झाँसी, लखनऊ, आगरा और अन्ततः दिल्ली प्रवास से सम्बन्धित लेखों को डाल दिया गया। इसके बाद भी उन्हें जहाँ कोई कमी लगी उसे उन्होंने स्वयं लिख कर पूरा कर दिया। जो कहीं फिट नहीं हुआ उसे अन्त के अध्याय 'रेखाचित्र' में डाल दिया गया। पुस्तक और परिवार के महत्त्व पर कुछ गम्भीर सामग्री 'परिवार की बात' में दी गयी है। इसके अलावा एक परिशिष्ट भी है जो अपने आप में रोचक है।
समाजशास्त्रीय सामग्री के अलावा आपको इसमें ललित गद्य के नमूने भी देखने को मिलेंगे।
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