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Ek Durjey Medha Vishnu Khare (एक दुर्जेय मेधा विष्णु खरे)

by Prakash Manu (प्रकाश मनु)

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  • ISBN: 9788181431363
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Hindi
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2025
  • Pages: 264
  • Original Price:Rs. 750.00
  • Language: Hindi
एक बड़े कंवि का संसार विष्णु खरे समकालीन कविता के सबसे जटिल, विलक्षण और शक्तिशाली कवि हैं जिन्होंने कविताएँ सिर्फ लिखी ही नहीं, बल्कि अपने बाद में आने वाले कवियों की कई पीढ़ियों को प्रभावित किया है। ऊपर से कई बार रूखी, गद्यात्मक और सपाट लगतीं विष्णु खरे की कविताएँ अपने भीतर समय और समाज का इतना गहरा द्वंद्व, सामाजिक-राजनीतिक हलचलें और मर्मांतक यातनाओं की कथाएँ लिए हुए हैं कि एक तरह से विष्णु खरे की कविताएँ समकालीन हिंदुस्तानी समाज का आईना ही नहीं, 'इतिहास' भी हैं। मुक्तिबोध की तरह विष्णु खरे भी ऐसे दुर्बोध लेकिन जरूरी कवि हैं जिनकी किसी से तुलना नहीं हो सकती - और अगर करनी ही हो, तो अकेले मुक्तिबोध ही हैं जिनसे किसी हद तक उनकी तुलना संभव है। मुक्तिबोध की तरह ही विष्णु खरे सिर्फ सच का ईमानदारी से पीछा करती कविताओं के कारण ही नहीं, बल्कि अपने विचारों, आलोचनात्मक लेखों तथा साहित्य, समाज और राजनीति पर अपनी एकदम मौलिक किस्म की टिप्पणियों के लिए भी जाने जाते हैं। यहाँ उनसे प्रेरणा या कहें 'रोशनी' पाने वाले कवियों, लेखकों, पाठकों की एक लंबी कतार है। बरसों से विष्णु खरे के निकट रहे प्रकाश मनु की पुस्तक 'एक दुर्जेय मेधा विष्णु खरे! इस विलक्ष्ण कवि को नजदीक से देखने-जानने के लिए 'एक अति संवेदी आईने' सरीखी है, जिसे पढ़ लेने का मतलब विष्णु जी के भीतर-बाहर की तमाम हलचलों का गवाह होने के साथ-साथ, अपने जाने हुए कवि को फिर से एक नए रूप में जानना है। इसलिए कि यह पुस्तक जाने हुए विष्णु खरे के साथ-साथ, अभी तक न जाने गए विष्णु खरे की खोज की बेचैनी से ही उपजी है। विष्णु खरे की कविताओं और अनूदित किताबों पर अनौपचारिक टीपों के साथ-साथ उन पर लिखा गया प्रकाश मनु का लंबा संस्मरण और समय-समय पर लिए गए चार खुले, विचारोत्तेजक इंटरव्यू विष्णु खरे के भीतर चल रहे और निरंतर तीव्र होते 'महाभारत' को भी गहरी अंतरंगता के साथ हमारी आँख के आगे ले आते हैं। विष्णु खरे का लंबा बहुचर्चित आत्मकथ्य 'मैं और मेरा समय' भी इस पुस्तक में है जो विष्णु जी की आत्मकथा के पन्नों को कविता की-सी हार्दिकता में खोलता है। लिहाजा यह एक जरूरी दस्तावेज बन चुका है। उम्मीद है, विष्णु खरे को समग्रता से देखने-जानने के उत्सुक लेखकों-पाठकों को इस पुस्तक से सुख मिलेगा।

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