Dohon Ke Chaupaal (दोहों के चौपाल)
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- ISBN: 9789350002247
- Binding: Hardcover
- BISAC Subject(s): Science
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2010
- Pages: 456
- Original Price:Rs. 395.00
- Language: Hindi
"वर्ष 27 की अंतिम वेला में दिल्ली निवासी प्रख्यात गजलकार और मेरे बहुत प्रिय मित्र श्री दीक्षित दनकौरी का फोन आया, बोले-'नाज़साहब, वाणी प्रकाशन ने दोहा-संग्रह तैयार करने का अनुरोध किया है। मैं चाहता हूँ इसकी ज़िम्मेदारी आप सँभाल लें।'
दीक्षित जी का फोन मुझे अनोखे आनंद से मालामाल कर गया, क्योंकि अब तक मैंने ग़ज़ल और गीत की पुस्तकों का तो संपादन किया था, लेकिन दोहों की किसी पुस्तक का नहीं। फिर दोहा तो आज इतनी लोकप्रिय विधा है कि उर्दू के रचनाकार भी दोहा-लेखन में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। कई उर्दू रचनाकारों ने तो इतने सुंदर दोहे लिखे हैं कि ईर्ष्या होने लगती है यह सोचकर कि इतना अच्छा ख़याल मेरे ज़हन में क्यों नहीं आया। यह अलग बात है कि उर्दू रचनाकारों के यहाँ अधिसंख्य दोहों में मात्रिक दोष मिलता है। कुछ भी हो, आज दोहा उनके यहाँ उसी गति से दौड़ रहा है, जिस गति से हिंदी-ग़ज़ल उच्छृंखलता के साथ छलाँगें भर रही है।
मैंने बगैर अधिक समय गँवाये देश के प्रमुख दोहाकारों को पत्र लिखकर 25-25 दोहे, संक्षिप्त परिचय और चित्र भेजने का अनुरोध किया। जहाँ-जहाँ मेरा पत्र पहुँचा, उनमें अधिसंख्य रचनाकारों ने वांछित सामग्री प्रेषित कर मेरा सहयोग किया। धीरे-धीरे मैं पुस्तक की कंपोज़िंग भी कराता रहा।
चूँकि रचनाकारों से दोहे आए हुए एक वर्ष से अधिक का समय व्यतीत हो चुका था, इसलिए पुस्तक की स्थिति को जानने के लिए कई रचनाकारों के मुझ पर फोन भी आए और मैं उन्हें सांत्वना देता रहा। यद्यपि दोहों के चयन और प्रूफरीडिंग में काफी सतर्कता बरती गई है, छंद की दृष्टि से कुछ मित्रों के दोहों में आंशिक संशोधन भी करना पड़ा, फिर भी यदि कोई त्रुटि रह जाती है, तो इसके लिए मैं अपने सभी वरिष्ठ साहित्यकारों के समक्ष क्षमाप्रार्थी हूँ। आपके विश्वास और आत्मीयता से मुझे जो प्रोत्साहन मिला है, वह मेरे लिए अविस्मरणीय भी है और अनुकरणीय भी और प्रेरणाप्रद भी। मैं अपने उन रचनाकार साथियों से भी क्षमा चाहता हूँ, जिनको पुस्तक में छंद की अत्यधिक त्रुटियों के चलते स्थान नहीं मिल सका।
हाँ, मैं यहाँ एक निवेदन भी करना चाहता हूँ कि दोहा-संग्रह रूपी इस गुलदस्ते में सभी प्रकार के फूल हैं और सभी का अपना-अपना रंग है, अपनी-अपनी खुशबू और पहचान है। मेरे लिए सभी सम्मानित और आदरेय हैं। मेरा उद्देश्य न तो किसी को विशेष रूप से सम्मानित करना है और न ही किसी की पगड़ी उछालना है। बस, यही सोचकर मैंने सभी रचनाकारों को वर्णानुक्रम के आधार पर पुस्तक में स्थान दिया है।
अंत में मैं दोहा-संग्रह में सम्मिलित सभी रचनाकारों का हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने मुझे असीम प्यार दिया। साथ ही विशेष आभार रीतिकाल के मर्मज्ञ और प्रख्यात विद्वान श्रद्धेय डा. रामानन्द शर्मा जी का, जिन्होंने मेरे एक ही निवेदन पर अपनी व्यस्तताओं को मेरे हवाले कर दिया और दोहों के स्वरूप और विकास के सम्बन्ध में उत्कृष्ट लेख लिखकर मुझको दिया। और, आदरणीय भाई दीक्षित दनकौरी जी, उनके लिए तो मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि उनके आत्मीय सहयोग और सप्रयासों का ही परिणाम है यह पुस्तक।
कृष्ण कुमार 'नाज़'"
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