Dhool Paudhon Par (धूल पौधों पर)

Dhool Paudhon Par (धूल पौधों पर)

by Govind Mishr (गोविन्द मिश्र)

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  • ISBN: 9788181439659
  • Binding: Paperback
  • BISAC Subject(s): Ghazal
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2014
  • Pages: 160
  • Original Price:Rs. 325.00
  • Language: Hindi
"संसार में जो यों ही कहीं टपका दी गयी, कोरे काग़ज़ पर एक अकेली बूँद... ""मुझे लगता है में एक बंजारिन हूँ जो एक अदद घर के लिए कब से भटक रही है..."" उस लड़की की संघर्ष गाथा । ""तुम्हें क्या चाहिए आदमी में?"" ""उसका मन आपके मन जैसा सुन्दर हो..."" ""वह सामने के मँझोले क़द वाले एक पुराने झाड़ को देखने लगी। पतली डालियों वाला, गोल-गोल काटा गया, तराशा हुआ वह एक आदमकद झाड़ था, तारों में कैद... समय-समय पर इधर-उधर से काटते-छाँटते हुए जिसे एक आनुपातिक पर गोलाई में ढाल दिया गया था। झाड़ की पत्तियों पर धूल थी जिसके कारण एक बासीपन उससे उठता था। एक चिड़िया डगालों के भीतर ऊपर-नीचे, इधर-उधर चींचीं करते हुए हो रही थी..."" प्रेमकथा... वे दो जिनमें एक जैसा कुछ नहीं, उम्र भी नहीं। हमारी शिक्षा व्यवस्था के कीचड़ का यथार्थ। धर्म दुकानें। परिवार के रास्ते भारतीय समाज की जकड़न- ""वह कहता है-सपने मत देखो। समाज जिसे जीवन में हासिल नहीं होने देता, उसके सपने भी नहीं देखने देगा? सपने तो देखने दो भाई !"" यह सब... या इनके भी पार, हाहाकार- ""देखते-देखते वह कुछ और हो जाती आँखें क्या, पूरा चेहरा ही सूजा हुआ... सपाट । कुछ बोलती नहीं, बस सूनी-सूनी आँखों से कहीं भी देखती हुई... एकदम ब्लैंक, जैसा पूरा शरीर ही निचुड़ गया हो। उसकी आवाज़ बदल जाती-बहुत भीतर के किसी गहर से निकलती गीली-गीली भारी आवाज़, फटी हुई... जैसे वह किसी और की थी। प्रेमप्रकाश को लगता जैसे कोई प्रेत उसके भीतर घुस गया और सुख की स्थिति से उसे बलात खींचता हुआ फिर से अवसाद में ले जाकर पटके दे रहा हो। ऐसे में वह अपने सुख की चीज़ों को भी बिथेड़ती हुई, अपने हितैषियों को भी लात मारती हुई खुद को विषाद के तल पर ला पटकती..."" ये मनुष्य हैं कि पौधे, जिन पर कैसे भी धूल आ बिछी ! "

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