Dand Prahaar (दण्ड प्रहार )
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- ISBN: 9789373481135
- Binding: Hardcover
- BISAC Subject(s): Reference
- Publisher: Nine Books
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2025
- Pages: 136
- Original Price:Rs. 795.00
- Language: English
‘दण्ड प्रहार’ हिन्दी के सर्वाधिक सक्रिय और अपने नये-नये विषयों के लिए ख्यात कथाकार भगवानदास मोरवाल का बारहवाँ उपन्यास है। यह केवल एक उपन्यास-भर नहीं है, अपितु 1925 ईसवी में स्थापित एक ऐसे संगठन की नित्य कथा है जिसमें हिन्दुत्व, संस्कृति और राष्ट्रवाद के नाम पर मनगढ़ंत क़िस्सों को गढ़ा जाता है, जिनका समावेशी भारतीय समाज से दूर-दूर तक नाता नहीं है। जिन नायकों ने इस देश को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराया, उन नायकों की छवियों को जिस तरह बदरंग करने की चेष्टाएँ की जाती हैं, उसका निर्मम आख्यान है। यह उपन्यास एक संगठन का इतिहास भी नहीं है। सबसे रोचक है उस संगठन द्वारा हिन्दू राष्ट्र के नाम पर एक ऐसा सपना दिखाना, जिसकी भविष्य में पूरे होने की कोई सम्भावना नहीं है।
‘दण्ड प्रहार’ सभ्यताओं के संघर्ष से उपजे एक ऐसे स्वयंभू सांस्कृतिक संगठन का दिन-प्रतिदिन का ऐसा लेखा-जोखा है, जिसने पिछले सौ सालों में भारतीय लोकमन और उसके सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को गहरी चोट पहुँचाई है। साथ ही यह भारतीय उपमहाद्वीप में तेज़ी से बँटती उन सांस्कृतिक दुर्बलताओं को परिभाषित करने वाली बहुलतावादी मानसिकता का बारीक विश्लेषण करता है, जिसके कारण आपसी संघर्ष, असहिष्णुता और वैमनस्य का दायरा तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। पिछले पाँच दशकों के दौरान जिस तरह धार्मिक, जातीय और ऐतिहासिक विरासत को सन्देह के घेरे में लाने के साथ-साथ, उस पर प्रश्नचिह्न लगाने के प्रयास किये जा रहे हैं, उसके आलोक में यह उपन्यास एक छोटी-सी समझ पैदा करता है।
यह उपन्यास उन सवालों से रह-रहकर मुठभेड़ करता है, जो हमसे पूछते हैं कि एक समाज के मूलभूत प्रश्नों का आधार उसके वैचारिक अथवा आर्थिक सरोकार होने चाहिए, अथवा धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सभ्यतागत संघर्षों से उपजे आपसी मतभेद? यह सवाल भारत जैसे विशाल और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक विश्वासों के साथ, तथा अपने आपमें साझी विरासत और सामूहिक विवेक को सहेजकर रखनेवाले विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक भारत जैसे देश के लिए और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि इन सवालों का उत्तर राजनैतिक विमर्शों के भोथरे औज़ारों से नहीं, सामूहिक विवेक में ही ढूँढ़ना सम्भव है।
यह अनायास नहीं है कि एक ओर जहाँ यह देश अपनी आन्तरिक दुश्वारियों से जूझ रहा है, तो दूसरी तरफ़ अपनी स्थापना के सौ साल पूरे होने पर एक संगठन जश्न में डूबा हुआ है। बल्कि कहना होगा इस देश का बड़ा वर्ग एक अनजाने भय के चलते सहमा हुआ है। इस उपन्यास में उस सहमेपन के सूत्रों को आसानी से खोजा सकता है।
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