Computer Kya, Kyon Aur Kaise (कम्प्यूटर क्या, क्यों और कैसे)

Computer Kya, Kyon Aur Kaise (कम्प्यूटर क्या, क्यों और कैसे)

by Ram Bansal 'Vigyacharya' (रामबंसल ‘विज्ञाचार्य)

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  • ISBN: 9788170557593
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Religion & Spirituality
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2017
  • Pages: 212
  • Original Price:Rs. 350.00
  • Language: Hindi
प्रत्येक पुस्तक एक मन्दिर के समकक्ष है जो पाठक को उसकी निष्ठा के अनुरूप फल देती है। किन्तु ऐसा तभी होता है जब लेखक ने उसके शब्दों में संविध प्राण प्रतिष्ठा की हो। हिन्दी में कम्प्यूटर विषयक यह मेरी नवीं पुस्तक है जिनके माध्यम से मैंने कम्प्यूटर सम्बद्धी हिन्दी शब्दावली का क्रमित विकास किया है। इस कारण से आरंभिक पुस्तकों में उपयुक्त की गयी शब्दावली तथा इस पुस्तक की शब्दावली में प्रचुर अन्तर हो गया है। आशा है पाठक इसे एक दोष के रूप में न मानकर सतत लेखन द्वारा शब्दावली व्युत्पत्ति की प्रक्रिया मानेंगे। इस पुस्तक तक आते आते सम्पूर्ण कम्प्यूटर शब्दावली का अभीष्ट विकास हो गया है जिनकी संकलित प्रस्तुति आगे एक शब्दकोप के रूप में करने की प्रबल अभिलाषा है। आशा है पूज्य गुरूदेव वेदव्यास द्वैपायन कृष्ण की दिव्य प्रभा सदैव की भाँति मुझे आश्रय प्रदान करती रहेगी। मेरे अनेक हितैषी मुझसे हिन्दी पुस्तकों में आंग्लभाषी शब्दावली के उपयोग का परामर्श देते रहे हैं क्योंकि वे आधुनिक सुविधावादी वर्ग का प्रतिनिधित्त्व करते हैं जिनकी कृपा से हिन्दी भाषा सतत विकृत होती हुई संस्कृत की उत्तराधिकारिणी के रूप में अपना सार्थक अस्तित्त्व खोती जा रही है। किन्तु में इस सम्बन्ध में गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को अपना आदर्श मानते हुए हिन्दी शब्दावली विकास पर बल देता रहा हूँ। श्री ठाकुर ने बाँगला भाषा में सतत लेखन करते हुए उस भाषा को 4, नूतन शब्दों का योगदान प्रदान किया था जिनके बल पर आज बाँगला भाषा एवं साहित्य भारत में सर्वश्रेष्ठ स्तर पर हैं। बाँगला भाषा में अभिव्यंजना हेतु किसी विदेशी भाषा के आश्रय की आवश्यकता नहीं होती, जबकि हिन्दी के अधुना प्रकाण्ड पण्डित भी विदेशी बर्बर लुटेरों एवं आधिपत्यकों की भाषाओं के आश्रय में अपना पाण्डित्य सिद्ध करने में व्यस्त हैं। वेद भगवान इन्हें स‌द्बुद्धि दे ताकि ये भी गुरुदेव ठाकुर की भंति हिन्दी की सेवा न भी करें तो इसे विकृत करते रहने के प्रयास न करें। विज्ञाचार्य राम बन्सल

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