Choti Choti Sacchaiyan (छोटी छोटी सच्चाइयाँ)
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- ISBN: 9788170555179
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Fiction
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 1997
- Pages: 218
- Original Price:Rs. 200.00
- Language: Hindi
साहित्य या और किसी भी विधा के इतिहास में एक ऐसा समय आता है जब बिना किसी उद्द्घोष के, बड़ी सहजता एवं सरलता से, एक ऐसी विभूति उभरती है जिससे एक नया सुखद अध्याय प्रारम्भ होता है, एक नई हलचल होती है। इस कृति को पढ़ने के बाद शायद आपको भी ऐसा ही लगेगा कि हिन्दी साहित्य में भी, एक लम्बे अन्तराल के बाद, ऐसा ही समय आ गया है।
हिन्दी कविता के पाठकों के लिए मोहन किशोर दीवान का नाम अभी भी अल्पश्रुत भले ही रहा हो, भावी सम्भावनाओं से समृद्ध अवश्य है। जिन पाठकों को शिविर-मुक्त तथा अकृत्रिम संवेदना से सुरभित शब्दों की सायास तराश से अछूते शिल्पवाली कविता की अविराम तलाश थी, उन्हें उसकी एक रुचिर बानगी इन कविताओं के माध्यम ये मिलेगी। इनका कैनवस बहुत बड़ा है -महानगर से प्रकृति के मृदु सुवासित टटके अंचल तक फैला हुआ, देह गन्ध से लेकर खरोच डाले जाने योग्य मुखौटों तक व्यापक, पर्त-दर-पर्त टूटते हुए अपने परिवेश से लेकर एक मानवीय सत्संकल्प की पूर्णकामतः की आश्वस्ति तक विस्तारकामी और अनगढ़ शिल्प का उच्छवास तो इन कविताओं में पग-पग पर खुल-खुल पड़ता है।
श्री लक्ष्मी चन्द्र जैन ने उन के सम्बन्ध में क्या खूब कहा है शब्द वासी और बोसीदा तब हो जाते है जब उन पर बेईमान अर्थों के सलीब टांग दिए जाएं। मोहन किशोर की सच्चाइयों की जमीन झूठ की खाद से नहीं पटी है। और न ही उन्होंने इस चेष्टा में अपनी सर्जनात्मकता को किसी कृत्रिम पौध की फसल का सहभागी बनाया है, जिससे वजनदार शब्दों की बैसाखियों पर वह सवारी करते। और जो सामने आया है, वह है अधखिले फूलों की निष्कलुष सुगन्ध और पकने को अकुलाते फलों का टटकापन' ।
उनकी कविताओं में 'जहां पुराने बासी शब्दों के अर्थों को धोने के लिए एवं एक ताजा अर्थ, नया बिम्ब, अभिनव अनुभूति देने के लिए शब्दों के झरने बहाना है जरूरी' वहीं 'जो विचार, धारा की तरह नहीं बहते उनका विसर्जन है अवश्यमभावी ।'
उनकी कविता उस भूमि की खोज में है 'जिस में नहीं है हांफते स्वप्न और अनाथ विचार भटकते हुए। जहां 'कलम का बाज़ार नहीं लगता और शहर शर्मिन्दगी से जुड़ा नहीं होता । उनका सूजन एकदम स्वाभाविक है, सीधा-सादा एक नवजात शिशु की किलकारियों जैसा अकृत्रिम किन्तु अर्थवान ।
उनकी कविताओं से एक ऐसी आदिम-गन्ध आती है पुनर्प्रकट होने को, कि लगता है एक बार उसका अनुभव प्राप्त करने के बाद, पाठक शायद सदा उस की खोज में तत्पर रहेगा, कस्तुरीमृग की तरह।
डॉ. जयप्रकाश
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