Chhat Par Mairathan (छत पर मैराथन )
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- ISBN: 9789369448142
- Binding: Hardcover
- BISAC Subject(s): Hindi
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2026
- Pages: 152
- Original Price:Rs. 350.00
- Language: Hindi
छत पर मैराथन 38 सालों से पत्रकारिता की दौड़ में कुछ मील के पत्थर, कुछ स्पीड ब्रेकर, विकल्पों के दोराहे, अनिर्णय के चौराहे और लाल-पीली हरी बत्तियों के अनुशासन के बीच अन्दर के पत्रकार को बचाये रखने का सीधा-सच्चा दस्तावेज़ है। जो कवर किया, जो आँखों देखा, जो कानों सुना उसे वैसे-का-वैसा लिख दिया है। पिछले 38 सालों में अख़बारों ने आधुनिक छपाई देखी है। न्यूज़ चैनलों में हर पाँचवें साल तकनीक अपग्रेड होती चली गयी है। डिजिटल मीडिया में तो सारा खेल ही एल्गोरिदम, लाइक, सब्सक्राइब और शेयर का है। लेकिन तब एक स्टोरी होती थी, कहानी कहने की कला होती थी। आज क्या हमारे समय का पत्रकार दिल पर हाथ रख कर कह सकता है कि कहानी की तलाश में वही जोश है, वही जुनून है? उस समय की स्टोरी में फील्ड रिपोर्टिंग बहुत होती थी। आज ‘लैपटॉप जर्नलिज़्म’ हो रहा है। टीवी न्यूज़ चैनलों में घण्टों की बहस के नाम पर ‘लेजी जर्नलिज़्म’ (आलसी पत्रकारिता) हो रहा है। पहले स्टोरी ख़ुद ही नैरेटिव बनाती थी। अब स्टूडियो नैरेटिव बना रहे हैं या यूँ कहा जाये कि इस भ्रम में हैं। छत पर मैराथन इस फर्राटा दौड़ को समझने की कोशिश है। ऐसा भी नहीं है कि हर कोई इस अन्धी दौड़ में शामिल है। पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थानों में जाना होता रहता है। विद्यार्थी कठिन सवाल पूछते हैं। पत्रकारिता की नयी पीढ़ी में अकुलाहट और बेचैनी दिखाई देती है जो आश्वस्त करती है। उधर हमारे समय के साठ पार पत्रकारों में से कुछ का कहना है कि पत्रकारिता की तो दरअसल मौत हो चुकी है। तो क्या छत के एक कोने में जाकर मौत का मातम मनाया जाये या छत पर मैराथन का अभ्यास किया जाये ?
वैसे 38 साल की भाग-दौड़ बेहद रोमांचक रही है। 1987 से 214 के बीच तो इतना कुछ घटा कि कभी फुर्सत ही नहीं मिली। बोफोर्स कांड, राजीव गांधी की हत्या, कमण्डल के बीच मण्डल, आर्थिक सुधार, कारगिल, गुजरात दंगा, बीजेपी की पहली वाजपेयी सरकार, राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी की दस्तक और कोरोना। 214 के बाद नयी तरह की राजनीति है, ओटीटी है, स्मार्टफोन हैं आदि-आदि है पर पत्रकारिता में कुछ तो है जो पीछे छूट गया लगता है। इस मैराथन में पत्रकारिता जैसे हाँफने लगी है। ऐसे में नये फेफड़ों की ज़रूरत महसूस होती है। ग़ालिब याद आते हैं :
ऐसा आसां नहीं लहू रोना,
दिल में ताक़त, जिगर में हाल कहाँ।
फ़िक्रे दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये बवाल कहाँ।
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