Bure Mausam Mein (बुरे मौसम में)

Bure Mausam Mein (बुरे मौसम में)

by Khalid Javed (खालिद ज़ावेद)

Ships in 1-2 Days

Choose a Book cover type:

Secure Payment Methods at Checkout

Visa Mastercard Google Pay PayPal UPI American Express ...50+
  • ISBN: 9789350001899
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Reference
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2010
  • Pages: 70
  • Original Price:Rs. 350.00
  • Language: Hindi
बुरे मौसम में - 'बुरे मौसम में' की कहानियों का केन्द्र घटना के बजाय वह मनोवृत्ति है जिसके द्वारा हम व्यक्ति की मानसिक परिस्थितियों तक पहुँच सकते हैं। इन कहानियों में एक अनकहा अहसास है जो आम इन्सानों के अन्दर घुटता है। कहानीकार उसे कहानी का शरीर देकर बाहर की हवा में ले आता है। अगर साहित्य का एक उद्देश्य कैथार्सिस भी है तो ख़ालिद जावेद की कहानियाँ इस कैथार्सिस का काम भली भाँति करती हैं। आम तौर पर कहानी में जिस केन्द्रीकरण और एकत्व की बात की जाती है, वह ख़ालिद जावेद के केन्द्रीकरण और एकत्व के दायरे को तोड़ कर अपने लिए एक नयी सृष्टि की रचना करती है।   अन्तिम पृष्ठ आवरण - आपकी कहानी 'बुरे मौसम में' का अंग्रेज़ी अनुवाद Season of fever पढ़कर में बहुत प्रभावित हुआ हूँ। कहानी अद्भुत है। इसमें इस क़िस्म की Dark intensity पायी जाती है जो मैंने अब तक अपनी पढ़ी हुई किसी कहानी में नहीं देखी... आप अपनी दूसरी कहानियों का अनुवाद ख़ुद ही हिन्दी में क्यों नहीं कर लेते? आपके कहानी लिखने का अन्दाज़ और बयान इतना नया है कि हिन्दी वालों को भी इससे परिचित होने का मौका मिलना चाहिए। -निर्मल वर्मा ख़ालिद जावेद की कहानियाँ अपने पढ़े जाने से ज़्यादा सर-रियलिस्टिक तस्वीरों की एक श्रृंखला की तरह अपने देखे जाने की माँग करती हैं। वह बस यही नहीं देखते जो सामने दिखाई देता है। उनकी कोशिश होती है अपने पात्रों और उन पात्रों के ज़रिये सामने आने वाली परिस्थितियों के छिपे कोनों और परतों तक पहुँचने की। ....ये कहानियाँ बहुत ‘अकेली और बेमेल' और हर तरह की बाहरी 'मदद और सहारे' से वंचित कहानियाँ हैं... इनको सहारा मिलता है सिर्फ़ अपनी घनी सरकश ज़बान और हर तरह की बाहरी बन्दिशों को ख़ातिर में न लाने वाले बयान से... गहरे अस्तित्ववादी प्रश्नों और वैचारिक बहसों के पहलू ख़ालिद जावेद के यहाँ इस ख़ामोशी के साथ सामने आते हैं जैसे टहनियों पर आँखवे और कोपलें फूटती हैं। ये कहानियाँ करअत उल-ऐन हैदर, इन्तिज़ार हुसैन, नय्यर मसूद की कहानियों से तो अलग हैं ही, समकालीन लिखने वालों से भी कोई समरूपता नहीं रखतीं। -शमीम हनफ़ी ख़ालिद तुम्हारी कहानियाँ पढ़ कर मुझे अपने दो बहुत पसन्दीदा कहानीकार याद आते हैं। एक तो पोलैंड का कहानीकार 'ब्रोनो शुल्ज़' और दूसरा 'काफ्का'। इन कहानियों का माहौल चमकदार नहीं है बल्कि वह धुंधले-धुंधले अंधेरे की तरह है जिसमें चीज़ें अपनी असली शक्ल में नज़र आने की ज़िद करती दिखाई देती हैं और जहाँ घटने वाली घटना उस धुँधले अँधेरे में चलने वाली साँसों और घड़कनों की आवाज़ को भी दर्शाती हैं। मगर सबसे अहम इन कहानियों का वर्णन है। यह वह समय है जो किसी भय की तरह हमारे चारों ओर फैला है। इस वर्णन के द्वारा हम अपने समय को एक पाथोस की शक्ल में देखते हैं। तुम्हारे इस नये क़िस्म के वर्णन के अनोखेपन और इसकी जबरदस्त अर्थपूर्णता को सामने रखते हुए में बिना किसी डर के कह सकता हूँ कि अगर यह सारी कहानियाँ हिन्दी साहित्य तक भी पहुँच जायें, तो हिन्दी में भी एक नये स्टाइल की नींव पड़ सकती है। -उदय प्रकाश  

Author information not available.

Trusted for over 24 years

Trusted for over 24 years

Family Owned Company

Secure Payment

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Need Support?

Whatsapp Us

Bestselling

View All
Goutam Biswas
₹178 ₹200 (- 11 %)
B.S. Hari Shankar
₹623 ₹700 (- 11 %)
Sushil Kumar Srivastava
₹456 ₹495 (- 7 %)
Neeta Yadav
₹1602 ₹1800 (- 11 %)
Prabodh Kumar Mishra
₹428 ₹480 (- 10 %)
Dilip K. Chakrabarti
₹979 ₹1100 (- 11 %)
Naresh Kumar
₹1335 ₹1500 (- 11 %)
Sujata Miri, Karilemla
₹557 ₹625 (- 10 %)
Alka Tyagi
₹579 ₹650 (- 10 %)
Marta Vannucci
₹579 ₹650 (- 10 %)
G.P. Singh
₹890 ₹1000 (- 11 %)
Charles J. Naegele
₹445 ₹500 (- 11 %)