Bouddhik Sampada Sanrakshan Aur Tikau Vikas (बौद्धिक सम्पदा संरक्षण और टिकाऊ विकास)
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- ISBN: 9788181437679
- Binding: Hardcover
- BISAC Subject(s): Reference
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2008
- Pages: 319
- Original Price:Rs. 350.00
- Language: Hindi
"सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनोन्मुख बुद्धिजीवियों और समतामूलक समाज की रचना में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए बेहद उपयोगी इस पुस्तक में बौद्धिक सम्पदा संरक्षण और टिकाऊ विकास की अवधारणा के भूमंडलीय कानूनी पहलुओं पर रोशनी डाली गई है।
बौद्धिक सम्पदा संरक्षण एक ऐसा विषय है जिस पर साहित्य का लगभग अभाव ही है, बावजूद इसके कि यह प्रश्न हमारे रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने की स्थिति में आ चुका है। भूमंडलीकरण की दौड़ में पूरी तरह शामिल भारत ही नहीं अन्य विकासशील देशों की सरकारों ने भी महसूस कर लिया है कि बौद्धिक सम्पदा अधिकार अंगीकार करने के बावजूद उन्हें कुछ विशेष उपाय अपनाने होंगे ताकि उनके जैसे नव-स्वाधीन देशों के हितों की रक्षा की जा सके। विकासशील देशों का हित इसी में है कि वे टिकाऊ विकास की अवधारणा की रोशनी में बौद्धिक सम्पदा अधिकारों को देखें। ट्रिप्स समझौते के कारण हुए बौद्धिक अधिकारों के अंतर्राष्ट्रीयकरण की तेज प्रक्रिया ने भी विकासशील देशों को इन अधिकारों के प्रति जागरूक किया है। ट्रिप्स द्वारा आरोपित न्यूनतम मानकों के कारण अलग-अलग जरूरतों का सवाल सामने आ गया है। इसके कारण बौद्धिक सम्पदा अधिकारों से संबंधित विमर्श में एक नया आयाम पैदा हो गया है जिसके विश्लेषण की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता।
जब से भारत सरकार ने ट्रिप्स समझौते पर दस्तखत किए हैं, तभी से उसका रवैया अपने देश की जनता की जरूरतों की तरफ से लापरवाही का हो गया है। अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद भारत का पेटेंट कानून पश्चिमी मॉडल से अलग रहा है। वह विदेशी कंपनियों की कीमत पर घरेलू उद्योग को प्रोत्साहित करता था और उसकी दिलचस्पी घरेलू उत्पादकों को मिले इजारेदारी अधिकारों को नियंत्रित करने में थी। आजादी के पहले भारत में दवाओं के दाम दुनिया में सबसे ज्यादा थे, पर इस कानून के कारण आज वे काफी गिर चुके हैं। इसी कानून के कारण भारत का दवा उद्योग 25 फीसदी से विकसित होकर इस समय जरूरत की दवाओं का करीब सत्तर फीसदी बना रहा है। कुछ स्थानीय कंपनियों ने नई दवाएं बनाने में विशेषज्ञता हासिल कर ली है। हालाँकि इस पेटेंट प्रणाली से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सभी को औषधियाँ मुहैया कराने में अपनी भूमिका निभाएगी, पर इससे टिकाऊ विकास प्रोत्साहित करने के मामले में खासा सकारात्मक असर जरूर पड़ा। आपत्तिजनक ट्रिप्स कानूनों के बाद हुए परिवर्तनों पर भारत में कोई राष्ट्रीय बहस नहीं हो रही है। सरकार और संसद में इस सवाल पर अंतर्विरोध है। फिलिप कुलेट की पुस्तक इस प्रश्न पर राष्ट्रीय बहस को नई गति देने की भूमिका निभा सकती है।
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