Bhrashtachar Ke Sainik (भ्रष्टाचार के सैनिक)
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- ISBN: 9789352296422
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): History
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2017
- Pages: 172
- Original Price:Rs. 350.00
- Language: Hindi
"प्रेम जनमेजय के व्यंग्यों को वर्षों से पढ़ते हुए, निःसंकोच कह पा रहा हूँ कि परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल के व्यंग्यों की इन्हीं खासियतों को आजदिन मुट्ठियों में जो मुट्ठीभर व्यंग्यकार सँभाले हुए हैं-प्रेम उनमें अन्यतम हैं। उच्चतर व्यंग्य की तीसरी विशेषता है- 'उपयुक्त व्यंग्य-क्षेत्र' का निर्माण । व्यंग्य का स्तरीकरण मात्र व्यंग्य-वस्तु, विषय, भाव, वार्ता या सन्देश व कथ्य-कहन से तय नहीं होता। देखना यह है कि उस अभिकथन पर संरचना का निर्माण कैसा हुआ है, व्यंग्यकार ने जीवन की एक छोटी सी विसंगति की कौंध पर विद्रूप का निर्माण किस तरह किया है। कई बार तो मुझे लगता है कि अवबोध की तुलना में 'निर्माण का अवबोध' व्यंग्य के लिए महत्त्वपूर्ण बन जाता है। व्यंग्य की अभिनवता या उसका चमत्कार, विसंगति पर विद्रूप के निर्माण का चमत्कार है-और यह उपर से नहीं आता बल्कि चिन्तन के विशिष्ट पैटर्न से आता है।"
- डॉ. गौतम सान्याल
"प्रेम जनमेजय उन गिने-चुने गम्भीर व्यंग्य लेखकों में से हैं जिन्होंने इस विधा के साथ बाजारू समझौते नहीं किये हैं। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि व्यंग्य विधा की अखण्ड ज्योति जलाने के लिए उन्होंने अपने समय और साधनों का एक बड़ा अंश इसमे लगाया है। उन्होंने इस विधा में न केवल रचनात्मक योगदान किया अपितु वैचारिक एवं सम्पादकीय सहयोग द्वारा भी इसे समृद्ध किया। प्रेम जनमेजय के व्यंग्यों को पढ़कर आश्वस्ति होती है कि वे अपनी उसी लीक पर चल रहे हैं जिस पर उनके विधा गुरु परसाई जी चले थे। कहीं कोई विपथन अथवा विचलन नहीं, सिर्फ ध्येय को समर्पित । परसाई की ही भाँति उनके व्यंग्य लेखन में कथा-तत्त्व प्रबल है।"
- 'हंस' में अजय नावरिया
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