Barf Aur Safeed Kabra Per Ek Phool (बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल )

Barf Aur Safeed Kabra Per Ek Phool (बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल )

by Devshankar Navin (देवशंकर नविन )

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  • ISBN: 9788181434791
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Religion & Spirituality
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2006
  • Pages: 240
  • Original Price:Rs. 375.00
  • Language: Hindi
".... पराधीनता से मुक्ति मिलने के बाद... जब... देश में लोकतंत्र बहाल हो गया और लोकतंत्र के नए-नए लज्जास्पद परिणाम फलने लगे; पद, पैसा और परस्त्री को नोच-नोचकर खाते रहने और जश्न मनाने की हरकतों की फसल लहलहाने लगी तो राजकमल चौधरी को कहना पड़ कि वाकई "" आदमी को तोड़ती नहीं है लोकतांत्रिक पद्धतियां केवल पेट/ के बल उसे झुका देती हैं/धीरे-धीरे अपाहिज, धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए उसे शिष्ट राजभक्त, देश-प्रेमी नागरिक बना लेती हैं"" और आगे फिर कहा कि ""रंडियों की काली और अंधी दुनिया में मसानों में अधजली लाशों को नोचकर खाते रहना श्रेयस्कर है, जीवित पड़ोसियों/ को खा जाने से/हमलोगों को अब शामिल नहीं रहना है / इस धरती से आदमी को हमेशा के लिए/खतम कर देने की साजिश में (मुक्ति प्रसंग)।"" लोकतांत्रिक पद्धति की जिस व्यवस्था में जनपद की यह दुर्दशा हो, जहां आदमी को हमेशा के लिए खतम कर देने की साजिश चल रही हो, वहां यदि साहित्यकार भी अपनी दुकानदारी में लग जाएं तो फिर साहित्य की जरूरत क्या रह जाएगी? राजकमल का लेखन साहित्यकारों के जनसरोकार से संबद्ध इन्हीं प्रश्नों का जवाब देता है। कथेतर गद्य लेखन में मुख्य रूप से इनके पत्र, डायरी, पुस्तक समीक्षा, साहित्यालोचन, संगीत-सिनेमा, नृत्य, चित्रकला आदि से संबंधित शोधपूर्ण, युक्तिसंगत, दृष्टिसंपन्न विवेचनात्मक लेख, सामाजिक-राजनीतिक परिस्थतियों पर चिंतनपरक निबंध, साहित्य की विविध विधाओं को और समय-समय पर उसमें चलाए गए विविध आंदोलनों को केंद्र में रखकर लिखे गए आलेख, रचनाकार विशेष और कृति विशेष पर केंद्रित लेख, साहित्य के विविध वादों की मौलिकता और औचित्य की पड़ताल, विदेशी लेखकों और विदेशी रचनाओं के अनुवाद एवं उनकी साहित्यिक भूमिका की चर्चा, पाठकीय प्रतिक्रिया, और कुछ रेडियो रूपक एवं नाटकों को गिना जा सकता है। साहित्यिक मित्रों, कुछ गैरसाहित्यिक लेकिन आत्मीय मित्रों, कुछ प्रेमिकाओं, कुछ पत्रिका के संपादकों को लिखे इनके पत्र और जीवन के एकांत-अंतरंग क्षणों में लिखी गई इनकी डायरी ने तो साहित्य में इस उपक्रम के महत्व को उत्कर्ष दे दिया है। अपने पत्रों और डायरियों में ये विषय से नितांत आत्मिक रहने के बावजूद उसके विवेचन में इतने उदार और ब्रॉड हो गए हैं कि वह एक शानदार साहित्यिक लेखन का संकलन लगता है। सारा कुछ निजी जीवन का आत्मिक भोग होने के बावजूद वहां कुछ भी, लेखक का अपना नहीं लगता, सब कुछ सामाजिक और सार्वजनिक लगता है। "

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