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Bahujan Sahitya Ke Naye Ayaam (बहुजन साहित्य के नये आयाम)

by Harinarayan Thakur (हरिनारायण ठाकुर)

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  • ISBN: 9789369445387
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Religion & Spirituality
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2026
  • Pages: 208
  • Original Price:Rs. 695.00
  • Language: Hindi
‘‘अस्मितामूलक विमर्श के दौर में स्त्राी और दलित साहित्य के बाद ‘बहुजन साहित्य’ एक नया विमर्श है। फुले-अम्बेडकरी चेतना से सम्पन्न साहित्य को ‘बहुजन साहित्य’ कहते हैं। यह जोतिबा फुले के प्राचीन शूद्र-अतिशूद्र और आज के दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक जैसे हाशिये के लोगों, जिनमें स्त्रिायाँ भी शामिल हैं, के जाति, लिंग, संस्कृति और सम्प्रदाय-भेद जनित दुख-दर्द-पीड़ा, शोषण और उससे उत्पन्न आर्थिक और सामाजिक विषमता को व्यक्त करता है। यह स्थिति के प्रति असन्तोष, आक्रोश, प्रतिरोध, प्रतिकार और मान-स्वाभिमान को रचनात्मक ढंग से व्यक्त करता है। इसका केन्द्रीय विषय ‘सामाजिक न्याय’ है। इसे कोई भी रचनाकार लिख सकता है। किन्तु दलित और स्त्री साहित्य की तरह यह भी स्वानुभूतिपरक साहित्य है। इसीलिए बहुजन समाज के दलित-पिछड़े-आदिवासी-अल्पसंख्यक और स्त्रिायों द्वारा रचित साहित्य को ही प्रामाणिक माना जा सकता है। असल में जब दलित और आदिवासी साहित्य आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ा, तो ‘ओबीसी’ और ‘बहुजन साहित्य’ की अवधारणा भी विकसित होने लगी। समाजवादी साहित्य ख़ासकर फणीश्वरनाथरेणु जैसे कथाकारों की रचनाओं में व्यक्त बहुजन संवेदना की पड़ताल होने लगी। रेणु की कहानी और उपन्यासों में चित्रित नाई, कहार, कुम्हार, कुर्मी-धानुक, महतो, रविदास, आदिवासी आदि पात्रों के माध्यम से तत्कालीन समय और समाज की समीक्षा होने लगी। इस दृष्टि से रेणु के साथ-साथ चन्द्रकिशोर जायसवाल, मधुकर सिंह, रामधारी सिंह दिवाकर, संजीव आदि की रचनाओं को देखा जा सकता है। दलित साहित्य की तरह ज़ाहिर है प्रेमचन्द, जैनेन्द्र कुमार, नागार्जुन, दुष्यन्त कुमार, अदम गोंडवी आदि कवि-साहित्यकारों के किसान-मज़दूर सम्बन्धी सहानुभूतिपरक कथासाहित्य और कविताओं को भी इसके विमर्श के दायरे में रखा जा सकता है। दलित साहित्य के केन्द्र में अम्बेडकरवादी दर्शन और चिन्तन है और अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाकर एक वैकल्पिक राह बनायी थी। ‘बहुजन साहित्य’ में अम्बेडकर के अलावा फुले, पेरियार और लोहिया, कर्पूरी आदि के चिन्तन और दर्शन को भी स्वीकार किया जाता है। कुछ हद तक यह गांधी दर्शन से भी प्रेरित और प्रभावित है। यह द्रविड़, सिक्ख, अल्पसंख्यक, आदिवासी और पूर्वोत्तर के जनजाति आन्दोलन से भी प्रभावित है। ‘बहुजन साहित्य’ का दायरा बड़ा है। यह शत-प्रतिशत सेक्युलर और मानवतावादी है। इसीलिए मनुष्य और मनुष्यता के पक्ष में खड़ा है। यह किसी भी वर्चस्ववादी विचारधारा का विरोधी है। -भूमिका से चर्चित लेखक हरिनारायण ठाकुर की यह पुस्तक उनकी अन्य पुस्तकों की तरह ही आम पाठकों, छात्र-शिक्षक और शोधरथियों के लिए विचारोत्तेजक, ज्ञानवर्धक और उपयोगी सिद्ध होनेवाली है।

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