Baghair Naqshe Ka Makan (बगैर नक़्शे का मकान)
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- ISBN: 9789350725498
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Fiction
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2015
- Pages: 72
- Original Price:Rs. 175.00
- Language: Hindi
"बहुत कम जोगों को मालूम होगा कि शापरी शुरू करने से पहले में कहानियों, अफसाने और ड्रामे लिखता रहा। हमारे उस वक्त के साथ एक ड्रामानिगार की हैसियत से ही जानते थे। मेरी बहुत सी कहानियों और अफसाने उस जमाने में कलकत्ते के अखबारों और उर्दू रिसालों में छपे भी थे। लेकिन कुछ नौजवान दोस्तों और शायरों की जिद पर मैंने गद्य का मैदान छोड़कर शायरी की तरफ तवज्जो देना शुरू कर दिया और उम्र का एक बड़ा हिस्सा काफ़िया और रदीफ की भूलभुलैया में गुजार दिया। लेकिन इसके बावजूद शायद में शायरी में बहुत कुछ नहीं कर सका। हालाँकि इसका फैसला भी पचास बरस के बाद होना है क्योंकि शायरी कोई वन-डे शिर्केट मैच तो होती नहीं है कि सबेरे बोपी जाए और शाम तक फल देने लगे। मुझे ये लिखने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी कि जो इज्जते और शोहरते मुझे हासिल हैं ये मेरा नसीब है। मेरी शायरी का मेहनताना हरगिज नहीं।
उम्र के आखिरी पड़ाव पर अचानक मुड़कर देखा तो कहीं एक जानी-पहचानी फाँस मेरी कला की रूह में छिपी हुई दिखाई दी। इसी बेचैनी और उलझन से निजात पाने के लिए मैंने गद्य लिखना शुरू किया। अच्छी और बुरी दोनों तहरीरे एक ही उत्तम से लिखी जाती हैं। एक ही लिखने वाला भी होता है लेकिन मजे की बात तो ये है कि अच्छे लेखन को फनकार अपनी मेहनत मान लेता है। बुरी तहरीरों का जिक्र आते ही खामोश हो जाता है या नसीब का ठीकरा फोड़ने लगता है।
मुझे अपने कद को नापने की अभी तक फुर्सत ही नहीं मिली। अपनी साहित्यिक उपलब्धियों गिनवाने का कभी खब्त सवार नहीं हुजा। मैंने न बचपन में लंगड़ मारकर पतगें हासिल की न जवानी से आज तक सोर्स-सिफारिश और खुशामद से कोई ओहदा या इनाम हासिल किया। लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरा लिखा हुआ मेरे काम ती नहीं जाया लेकिन साहित्य के काम हमेशा आता रहेगा।
मुनव्वर राना
"
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