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Badalon Ka Tabadalon Se Sambandh (बादलों का तबादलों से संबंध)

by Jabbar Dhankwala (जब्बार ढाँकवाला)

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  • ISBN: 9788170554098
  • Binding: Paperback
  • BISAC Subject(s): Philosophy
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2012
  • Pages: 192
  • Original Price:Rs. 195.00
  • Language: Hindi
"हिन्दी व्यंग्य के समकालीन परिदृश्य में एक अजीव भभ्भड़ मचा हुआ है। व्यंग्य को एक अत्यंत सरल कार्य मान लिया गया है। लगभग बच्चों का खेल जैसा। एक घिसा-पिटा चुटकुला, व्याकरण तक को धता बताती पिटी सपाट भाषा और न जाने किसी पारलौकिक या वायवीय जीवन का साक्षात्कार कराती ऐसी रचना जिसमें न हास्य है, न विट, न लक्षणा-व्यंजना, न आयरनी, न बात को कहने का ढंग, फिर भी एक बालहठ-सी है कि व्यंग्य कहा जाये। अपने व्यंग्य कॉलमों के जरिये हिन्दी व्यंग्य की झोली में नित नया कचरा फेंकने को अभिशप्त दैनिक-साप्ताहिक अखबार इन 'अद्भुत की हद तक' बोर तथा मनहूसियत से सराबोर रचनाओं को व्यंग्य के नाम पर हर दिन पाठकों के सामने परोस रहे हैं। यदि ये व्यंग्य है, तो हिन्दी में इतने व्यंग्यकार पैदा हो चुके हैं कि हिन्दी व्यंग्य का छकड़ा किसी दिन भी इनके बोझ से दबकर बैठ जाने वाला है। ऐसे खतरनाक हैरतअंगेज, डरावने नये व्यंग्यकारों में जब कोई जब्बार ढांकवाला पढ़ने को मिल जाता है तो निराशा थोड़ी छंटती है। व्यंग्य को पूरी गंभीरता से लेने तथा लिखने वाले चंद युवा व्यंग्यकारों में मुझे जब्बार भी नजर आते हैं। जब्बार में अच्छी बात यह है कि वे व्यंग्य में नित नया करने तथा सीखने को तत्पर हैं। उनकी रचनाओं में विषयगत तथा भाषागत सर्तकता है तथा बात को कहने का ढंग है, जो आज के व्यंग्य में इधर बेहद चिंताजनक हद तक गायब सी शै है। मैं यह तो नहीं कहता कि जब्बार की ये रचनायें हिन्दी व्यंग्य को नयी दिशा देने वाली या क्रांतिकारी स्थान बनाने वाली व्यंग्य रचनायें हैं परन्तु यह कहने की हिम्मत जरूर करता हूँ कि इन रचनाओं को पढ़कर जब्बार से एक आशा बंधती है। अब इस आशा को जगाये रखना तथा पूरी करना जब्बार के हाथ में है। मुझे विश्वास है कि वे मुझे गलत साबित नहीं होने देंगे। -ज्ञान चतुर्वेदी"

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