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Astitva (अस्तित्व)

by Astha Naval (आस्था नवल)

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  • ISBN: 9789373486628
  • Binding: Paperback
  • BISAC Subject(s): Reference
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2026
  • Pages: 154
  • Original Price:Rs. 695.00
  • Language: Hindi
आस्था नवल का उपन्यास अस्तित्व स्त्री-जीवन के गहरे दुख, उसकी चुप्पियों और संघर्षों से जन्मा है। आस्था सन् 27 में शादी के बाद से अमेरिका जाकर बस गयीं लेकिन यहाँ रहते हुए उन्होंने घर-परिवार, रिश्तों और समाज में लगातार नेपथ्य में खड़ी जिस स्त्री को देखा, वह छवि उनके साथ रही। यह आज़ादी के बाद के उस भारतीय समाज की कथा है जो परम्परा और आधुनिकता की उलझनों में फँसा है। अत्यन्त संवेदनशीलता और धैर्य के साथ आस्था ने औसत मध्यवर्गीय परिवार और समाज की वे परतें खोली हैं जिन्हें अक्सर सामान्य मान लिया गया है-बेटे-बेटी के बीच भेद, स्त्री पर घर और नौकरी की दोहरी जिम्मेदारियाँ, और उसका हर बार अपनी इच्छाओं को पीछे रखना। स्त्रियाँ-चाहे वे किसी भी पीढ़ी, जाति या वर्ग से हों-इन उलझनों के बीच जीती हैं, संघर्ष करती हैं और हर बार अपने जीवन को नये सिरे से परिभाषित करती हैं। अपने अस्तित्व की यह खोज स्त्री की उस चुप्पी को मुखर कर देती है जो अपने बलबूते पर खड़े होने के लिए अपने पैरों तले की जमीन तलाश रही है और अपने सपनों का मुट्ठी भर आसमान। अस्तित्व पढ़ते हुए यह अहसास गहराता है कि स्त्री का जीवन का संघर्ष केवल निजी नहीं, सामूहिक भी है। हर घर, परम्परा और अनुभव में उसकी कहानी कहीं न कहीं दुहराई जाती है। आस्था नवल ने सरल और प्रवाहमयी भाषा में इस आत्मीय कथानक को सहेजा और सँवारा है। पढ़ने के बाद भी उपन्यास की कुछ पंक्तियाँ देर तक कानों में गूँजती रहती हैं-"क्या लड़की होना इतनी बुरी बात है?", "जीवन सिर्फ अपना नहीं होता", "हर ओर दुख ही दुख है।" ये वाक्य केवल पात्रों की पीड़ा नहीं, बल्कि उस पूरे समाज की त्रासदी का दस्तावेज हैं जिसे हम जीते आये हैं। इस परिचित कथा सृष्टि में उपन्यास का अन्त सबसे अधिक प्रभावित करता है। स्वचेतना का बोध एक नये प्रारम्भ का संकेत देता है, उपन्यास के आरम्भ में जो असम्भाव्य-सा दिखता था वही उपन्यास के अन्त में रिश्तों की कैद से मुक्त स्त्री के होने से, उसके अस्तित्व से जगमगा उठा है, बन्द मुट्ठी में खिल आये जुगनू की तरह... - रेखा सेठी

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