Apne Apne Daav (अपने अपने दाँव )
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- ISBN: 9788181433145
- Binding: Hardcover
- BISAC Subject(s): Sahitya
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2025
- Pages: 660
- Original Price:Rs. 295.00
- Language: Hindi
मैं अपने लिखे नाटकों को सबसे पहले स्वयं ही मंच पर प्रस्तुत करता हूँ। स्वयं निर्देशित करता हूँ, या निर्देशन और प्रस्तुति से सम्बद्ध रहता हूँ। इसके द्वारा मैं नाटक का परीक्षण, विश्लेषण संशोधन, परिवर्धन एक निर्देशक की निगाह से करता हूँ। नाटक के रूप में अपने लिखे शब्दों, संवादों से कितना ही मोह क्यों न हो, निर्देशक के रूप में, मैं उनको निर्ममता से काटता छाँटता हूँ। निर्देशक के रूप में मेरा व्यक्तित्व नाटककार से एकदम अलग होता है। अतएव मैं अपने ही नाटक की मंच क्षमता के बारे में तटस्थ होकर एक अन्य व्यक्ति के समान टिप्पणी कर सकता हूँ। मैं इस नाटक की अनेक प्रस्तुतियों से सम्बद्ध रहा हूँ। दिल्ली और लखनऊ में कई प्रस्तुतियाँ कीं। 1976-79 के बीच में मैंने फीजी में इस नाटक के अनेक प्रदर्शन किये। सब ही प्रस्तुतियों में यह नाटक मंच पर खरा उतरा, दर्शकों को दो घंटे तक गुदगुदाता, और कभी-कभी खुल कर हँसाता रहा। इससे मैं इस नाटक की मंचीयता के प्रति आश्वस्त हूँ।
कभी-कभी मंच प्रस्तुति के पश्चात् मुझे एक दो कुछ ‘ज़्यादा पढ़े' विद्वान और समीक्षक मिले, जिन्होंने मुझसे पूछा कि यह नाटक कहना क्या चाहता है? इस प्रश्न में यह अन्तर्निहित है कि हर नाटक को कुछ कहना चाहिए। हर नाटक में कोई सन्देश होना चाहिए, या ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे कि दर्शक नाटक का सारांश निकाल सकें। या स्पष्ट शब्दों में नाटक में ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे 'सामाजिक परिवर्तन' लाया जा सके। नहीं तो कुछ भारी भरकम शब्दों का जाल, नये से लगते विचारों का उलझाव, आयातित मानदण्डों पर खरी उतरती ऊलजलूलता (एबसडिटी)-कुछ तो हो। मैं उनसे क्या कहूँ। कुछ ज़्यादा ही 'पढ़े लिखे' होने के कारण वह मेरी बात शायद नहीं सुनेंगे। सुनेंगे भी तो न सुनने का नाटक करेंगे। शेक्सपियर का 'हेमलेट' क्या कहता है ? कालिदास का 'शकुन्तला' नाटक कौन से सामाजिक परिवर्तन का झण्डा ऊँचा करता है? मौलियर के नाटक कौन-सा गुरुगम्भीर विचार प्रतिपादित करते हैं? नाटक की सफल प्रस्तुति जिसमें अभिनेता और दर्शक बराबर की साझेदारी अनुभव करें, क्या नाट्य-उद्देश्य की चरम-प्राप्ति नहीं है?
पूर्व - प्रस्तुतियों पर कुछ सम्मतियाँ
अपने शिष्ट हास्य, तीखे व्यंग, चुस्त संवादों, मनोरंजक स्थितियों एवं प्रभावशाली अभिनय से पूर्ण इस सुखांतक नाटक ने दर्शकों को अविस्मरणीय नाट्यानुभूति प्रदान की।
—नवभारत टाइम्स, नयी दिल्ली
लालच के रिश्तों में पड़ती दरारों की झलक देखी अपने-अपने दाँव में।
—राष्ट्रीय सहारा, लखनऊ
नाटक अपने-अपने दाँव का मंचन : रिश्तों की खोखली बुनियाद को उजागर किया। तमाम संवेदनाओं को लाँघ कर रिश्तों पर हावी होते स्वार्थ और भौतिकवाद को नाटक अपने-अपने दाँव ने उखाड़ कर रख दिया।...पैसे से बदलते ख़ून के रिश्ते की धार को बख़ूबी मंच पर देख दर्शकों के समक्ष सामाजिक विसंगति के विविध पक्ष उजागर हुए।
—अमर उजाला, मेरठ
पैसे के पीछे भागने वालों की दुर्दशा का मनोरंजक व व्यंगात्मक चित्रण है नाटक अपने-अपने दाँव में। सपना हुआ धराशाई जब सूटकेस में निकला जूता।... नाटक स्वार्थ के सामने खोखले पड़ते रिश्तों की मनोवैज्ञानिक पड़ताल है।
—जागरण, नोएडा
दकरते रिश्तों की कथा है अपने-अपने दाँव।... ‘अपने-अपने दाँव’ हँसते-हँसते लोभ की प्रवृत्ति पर चोट करने में सफल है।
—हिन्दुस्तान, लखनऊ
अपने-अपने दाँव की प्रस्तुति के दौरान दर्शक लगभग दो घंटे तक हँसते ही रहे। एक हास्य नाटक की सफलता का इसके अतिरिक्त और क्या मापदण्ड हो सकता है।... रोचकता तथा सूक्ष्म अभिनय ने मिला कर नाटक को एक ऐसी सुखद अनुभूति प्रदान की, जो बहुत दिनों तक याद रहेगी।
—जनयुग, दिल्ली
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