Agyeya Aur Unka Katha Sahitya  (अज्ञेय और उनका कथासाहित्य)

Agyeya Aur Unka Katha Sahitya (अज्ञेय और उनका कथासाहित्य)

by Gopal Rai (गोपाल राय )

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  • ISBN: 9789350004531
  • Binding: Hardcover
  • BISAC Subject(s): Hindi
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Release Year: 2010
  • Pages: 200
  • Original Price:Rs. 395.00
  • Language: Hindi
"यद्यपि अज्ञेय यह लिखकर स्वीकार कर चुके थे कि 'शायद कविता ही' उनकी 'सीमा' है, और व्यवहार में भी 196 के बाद उन्होंने उपन्यास और कहानी लिखना छोड़ दिया था (1961 में उनका अन्तिम उपन्यास अपने अपने अजनबी प्रकाशित हुआ था, और जनवरी, 1959 में अन्तिम कहानी हजामत का साबुन लिखी गयी थी), पर अज्ञेय बीसवीं शताब्दी के, हिन्दी के, अकेले लेखक हैं जिन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, व्यक्तिगत निबन्ध और अन्तःप्रतिक्रियाएँ, आत्मवृत्त, यात्रा-वृत्त, साहित्य-चिन्तन, नाटक, आलोचना आदि विधाओं में यशस्वी लेखन किया था। उनके मरणोपरान्त असमाप्त उपन्यासों - छाया मेखल और बीनू भगत के प्रकाशन के बाद तो अज्ञेय के इस 'आत्मस्वीकार' को मानने में भी हिचक होती है कि सचमुच ही 'कविता' उनकी 'सीमा' थी। यदि ऐसा हो, तो भी, यह तो स्वीकार करना ही होगा कि अज्ञेय के कथा-साहित्य को छोड़कर हिन्दी साहित्य का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। 1931-195 की अवधि की हिन्दी कहानी और 194-1961 अवधि के हिन्दी उपन्यास में अज्ञेय की उपस्थिति बेमिसाल है। इतना ही नहीं, उनके उपन्यास और अनेक कहानियाँ आज भी प्रासंगिक हैं और उनकी कालजीविता प्रत्याशित है। निश्चय ही उनके कथा-साहित्य का विवेचन और मूल्यांकन आज भी अप्रासंगिक नहीं है। अज्ञेय के उपन्यास-साहित्य से मेरा सम्बन्ध चार दशकों से ऊपर का है। पटना विश्वविद्यालय में जब मैं हिन्दी का प्राध्यापक नियुक्त हुआ तो मेरे जिम्मे अज्ञेय के शेखर : एक जीवनी का अध्यापन पड़ा। उस समय शेखर एक जीवनी का अध्यापन एक चुनौतीपूर्ण काम था। उसकी संरचना इतनी जटिल थी कि उसमें प्रवेश करना और उसे समझते हुए बाहर निकल आना आसान नहीं था। मुझे सन्तोष है कि मैंने शेखर : एक जीवनी के अध्यापन से अपने छात्रों को सन्तुष्ट किया और उस पर एक किताब भी लिखी जो बहुत लोकप्रिय हुई। 1974 में मैकमिलन की एक 'मूल्यांकन माला' योजना के अन्तर्गत मैंने अज्ञेय और उनके उपन्यास नामक पुस्तक लिखी, जो उसी वर्ष छपी भी। अब यह किताब, पूर्णतः संशोधित रूप में, और ईषत् भिन्न शीर्षक से, प्रकाशित हो रही है। संशोधन अपरिहार्य था। जब यह पुस्तक दूसरी बार प्रकाशित हुई थी, तब अज्ञेय जी जीवित थे। 1987 में उनका निधन हो गया। स्वाभाविक है कि दूसरे संस्करण में सम्मिलित अज्ञेय की 'जीवन-रेखा' में भी आवश्यक संशोधन और परिवर्धन किया जाए। उस समय तक उनकी कुछ और पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी थीं। सन् 2 ई. में उनके दो 'असमाप्त' उपन्यास भी प्रकाशित हो चुके हैं। पुरानी पुस्तक केवल अज्ञेय के उपन्यासों पर आधारित थी। प्रायः अज्ञेय की कहानियाँ उनके उपन्यासों के प्रकाश-वृत्त में पड़कर उपेक्षित हो जाती हैं। अतः इस पुस्तक में अज्ञेय की कहानियों के विवेचन को भी शामिल कर लेना संगत जान पड़ा। मुझे विश्वास है, यह पुस्तक अज्ञेय के प्रेमियों और विद्वानों को सन्तुष्ट करने में समर्थ होगी।"

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