Agneya Aur Poorvottar Bharat (अज्ञेय और पूर्वोतर भारत)
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- ISBN: 9789350007327
- Binding: Paperback
- BISAC Subject(s): Fiction & Fiction
- Publisher: Vani Prakashan
- Publisher Imprint: Vani Prakashan
- Release Year: 2011
- Pages: 244
- Original Price:Rs. 200.00
- Language: Hindi
"यह लेखन अज्ञेय की पूर्वोत्तर भारत की यात्राओं और प्रवास से जुड़ा है। अज्ञेय द्वारा की गयी यह पहल कितनी महत्त्वपूर्ण है यह बात आज हम आसानी से समझ सकते हैं। आज सभी महसूस कर रहे हैं कि पूर्वोत्तर राज्यों की ओर खास तौर पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ऐसा अब तक न किये जाने का परिणाम यह हुआ है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों ने अपने को उपेक्षित और अलग-थलग महसूस किया है और पूर्वोत्तर की समस्याएँ सुलझने की बजाय उलझती गयी हैं। छह दशक पहले अज्ञेय द्वारा प्रस्तुत पूर्वोत्तर सीमा प्रान्त की ये झाँकियाँ उन इलाकों की जातीय संवेदना से हमारा साक्षात्कार कराती हैं।
प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास, पुराण, मिथक साहित्य और लोक-विश्वासों के बीच भारत के सांस्कृतिक भूगोल की तलाश इन यात्रा-वृत्तान्तों और कहानियों का एक मूल्यवान पहलू है। दूसरी ओर आधुनिक समय के ज्वलंत प्रश्नों-उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद; जनजाति बनाम मूलधारा; मनुष्य, प्रकृति और वन्य जीवन के बीच सम्बन्ध और साहचर्य; महायुद्ध-महाशक्तियों के संघर्षों के नीचे पिसता आम आदमी विशेष कर सीमाक्षेत्रों की औरतें; सैन्य जीवन की विडम्बनाएँ; मोर्चे पर तैनात सैनिकों का मानसिक, भावनात्मक अधःपतन; उनकी मानसिक-शारीरिक समस्याएँ; शौर्य और पराक्रम की छलनाएँ-पूर्वोत्तर केन्द्रित इन कहानियों और यात्रा संस्मरणों में अन्तरंग मानवीय पीड़ा बोध और सहानुभूति के साथ मौजूद है।
स्वाभाविक ही था कि युद्ध से जुड़े अँधेरे पक्ष की ओर रचनाकार का ध्यान जाता । अज्ञेय की पूर्वोत्तर से जुड़ी कहानियाँ सैन्य जीवन से जुड़ी सामाजिक और वैयक्तिक विडम्बनाओं को उजागर करती हैं; मनुष्यता के अवमूल्यन के विभिन्न रूपों को उद्घाटित करती हैं। पचास के दशक तक हिन्दी में इस तरह की संवेदना की अभिव्यक्ति सम्भवतया एक पहल ही थी बहुत कुछ लेखक के अपने सैन्य सेवा के अनुभवों पर आधारित ।
मुक्तिबोध और अज्ञेय दोनों ने साहित्य को एक सांस्कृतिक प्रक्रिया माना है तो इसलिए साहित्य देशकाल की सीमाओं का अतिक्रमण करता हुआ हमारी संवेदना का विस्तार करता है । परम्परा की निरन्तरता को पहचानने और उसके बीच अपने तथा दूसरों के होने से जुड़े विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है। अज्ञेय का पूर्वोत्तर विषयक यह लेखन स्थानीय जीवन, प्रकृति, मिथक और जातीय सामूहिक अवचेतन की दृष्टि से प्राचीन और नवीन का एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक अध्ययन है।"
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