हे! नवभारत निर्माता डॉ. अम्बेडकर [भाग-2 प्रबुध्द-भारतोदय] (Hey! Navbharat Nirmata Dr. Ambedkar [Part-2 Prabudh Bharatodya])
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- ISBN: 9789353249731
- Binding: Hardcover
- Subject: History
- BISAC Subject(s): Reference
- Publisher: Kalpaz Publications
- Publisher Imprint: Gyan Books
- Publication Date: NA
- Release Year: 2022
- Pages: 334
- Original Price:Rs. 990.00
- Language: Hindi
पुस्तक के बारे में हे! नवभारत निर्माता डॉ. अम्बेडकर भाग-2 प्रबुध्द-भारतोदय यह ग्रंथ नव-भारतोदय का सहकारी प्रबुध्द-भारतोदय है। इस में बाईस आलेखों का संग्रह है। 1. आंबेडकरी क्रांति में धर्म को सामाजिक नजरिये से परखा गया है। 2. बाबासाहेब के बाद उनके मिशन का नेतृत्व करनेवाले भगत सिंह के सहपाठी, हिन्दी लेखक तथा बौध्द चिंतक के विचारों की प्रस्तुती संस्मरणः प्रो. डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन है। 3. बौध्दों में धार्मिक दृष्टी से विहारों में श्रध्दालुओं द्वारा जो वचन उच्चारित किए जाते हैं, उसे प्रार्थना नही बल्कि वंदना कहलाते है। 4. प्रजातंत्र के महान हस्ताक्षर डॉ. अम्बेडकर ने इसे राजनीति नही, बल्कि जीवन-पध्दति माना है। 5. भदन्त आनन्द कौसल्यायन जी ने इस पंकित के लेखक को राहुल सांकृत्यायन द्वारा इस्तेमाल की गई घडी मुझे वुल्वरहैम्पटन, यू. के. के विहार में रहते समय भेट की थी। उस बाबत संस्मरण ही इस अध्याय में है। जपानी भिक्षु संघरत्न मानके जी के निवेदन पर लिखित आलेख विहार निर्माण क्यों इसमें दर्ज है। इस पंक्ति के लेखक द्वारा सन 1918 में कुलपति की हैसियत से ब्राउस विश्वविद्यालय महू में महामहिम राज्यपाल महोदया द्वारा उद्घाटित और सर्वाधिक शिस्तबध्द दीक्षांत समारोह और उपसम्पदा विधि जो एक भिक्षु की दीक्षा में उतने ही अनुशासन से अपनाई जाती है, का इस अध्याय में तुलनात्मक विवेचन है। लेखक द्वारा लिखित विश्वविद्यालय कुलगान, मानव, समर वीर स्मरण के साथ म. प्र. के आदरणीय मुख्यमंत्री जी के विदेश दौरे के लिए लिखा गया अभिभाषण भारत, श्रीलंका, बुद्ध और अम्बेडकर इस में समाविष्ट है। बारहवे अध्याय में उपरोल्लेखित भदन्त जी के नजरिए से कबीर जी प्रस्तुत है। ग्लोबल अम्बेडकर कन्वेन्शन लंदन द्वारा आयोजित डीजिटल 129 वी डॉ. अम्बेडकर जयंती समारोह और 2564 वी बुध्द जयंती पर प्रस्तुत लिपिबध्द व्याख्यान अगले दो अध्याय में दर्ज हैं। अगले चार अध्यायों में जार्ज फ्लायड, सापेक्षता, और मैं, तत्कालीन महामारी संकट पर केन्द्रित रचनायें और हे बुध्दत्व के मुसाफिर नामक गई हैं। उन्नीसवा अध्याय दर्शन के अंगों-उपांगों को धारण करता है। महू (अब डॉ. अम्बेडकर नगर) विश्वविद्यालय में लेखक द्वारा रचित भारत उदय स्तंभ, और चीर स्मृति स्थान अगले दो अध्यायों में अंकित हैं। अंतिम अध्याय लेखक द्वारा चौबीस वर्ष की विश्वविद्यालयीन सेवा के पश्चात् अधिवार्षिकी में लिखा हुआ और एक फर्जी कुलपति के कर्मकांड पर केन्द्रित जांच को आंच पर संपन्न होता है। आशा है, सुधी पाठक इस प्रबुध्द-भारतोदय से कुछ प्रेरणा और लाभ प्राप्त कर सके तो ग्रंथ का सही ध्येय साकार हुआ माननेमें दो राय नही होगी।
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