जिस समय यह पुस्तक लिखी गई थी, उस समय भारत की आजादी की लड़ाई काफी उठान पर थी। आजादी में भाग लेने वाले अलग अलग दल चाहते थे कि सबका एक संयुक्त मोर्चा बना कर अंग्रेजोको शिकाशतदी जाती जाए। उस समय के वाम पंथी खेमें में इस शब्द का सही राजनीतिक अर्थ नहीं समझते थे अत: इसका गलत ढंग से प्रयोग करते थे।
इस पुस्तक में तत्कालीन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का विस्तार से हवाला देते हुए स्वामी सहजानंद सरस्वती ने संयुक्त मोर्चा की अवधारणा को स्पष्ट किया है। स्पष्ट करने के इस क्रम में उन्होंने काफी विस्तार से अनेक विदेशी राजनीति कर्मियों के विचारों को उदृत किया है जिनमें लेनिन और माओ त्सेतुंग प्रमुख हैं। इसमें भारत की परिस्थितियों में इसने विचारों की प्रासंगिता और सार्थकता पर प्रकाश डाला है।
आज भी हम किसी न किसी संदर्भ में संयुक्त मोर्चे की चर्चा सुनते हैं। कई विरोधी पार्टियां इसकी चर्चा करतीं रहती हैं। लेकिन याद रखने की बात यह है कि संयुक्त मोर्चा का आशय कुर्सी के लिए लड़ने वाले विरोधी दलों का अवसरवादी गठजोड़ नहीं होता है। यह उससे एकदम भिन्न बात होती है।
यह पुस्तक राजनीतिशास्त्र के अध्यापकों और छात्रों को इस अवधारणा को समझने में मदद करेगी।