किसान आंदोलन और जन आंदोलन की जरूरतों के मद्देनजर लिखी गई पुस्तक किसान क्या करें सहजानंद की कोरे बुद्धि विलास का व्यायाम नहीं है। पुस्तक की जरूरत के बारे में वे कहते हैं, किसान आंदोलन बहुत कुछ आगे बढ़ रहा चुका है। किसानों ने स्वयं अपनी बात सीधी लड़ाइयां भी बहुत कुछ लड़ी हैं मगर यह चीज नाकाफी है। यदि हम उनके और अन्य शोषितों के हाथ में शासन-सूत्र लाना चाहते हैं। यह बात क्रांति और भीषण उलट-फेर के बिना नहीं हो सकती है, और यह उलट-फेर किसानों के दिल और दिमाग में परिवर्तन चाहता है। हमें क्या करना है और कैसे करना है, यह समझ लेना निहायत जरूरी है।
सहजानंद की भाषा आम तौर पर सरल है लेकिन यह पुस्तिका विशेष रूप से घर-बार की बातों, पशुओं-पक्षियों के दिखाई देने वाले व्यवहारों, उदाहरणों और किस्सों-कहानियों की मदद लेते हुए बेहद सरल और सुबोध भाषा और बातचीत की शैली में कुछ इस तरह तैयार की गई है कि पता नहीं चलता कि खाने-पीने पहनने-ओढ़ने की बात करते-करते कब और कैसे गहरी दार्शनिक बातें समझा दी गईं।
किसान का जीवन पशु से भी बदतर है, यही झटका देकर सहजानंद किसान की चेतना जगाना चाहते हैं। तुम कुछ और नहीं तो, अपने बैल से ही सीखों, ‘यदि बैल बिना खाए-पीए गाड़ी और खींचता रहे तो कौन किसान ऐसा बेवकूफ है कि उसे खिलाने कि फिक्र करेगा ? ‘तात्पर्य यह कि अगर तुम बिना खाए-पिए सरकार, जमींदार और साहूकार का पावान चुकाए जा रहे हो तो यह तुम्हारी बेवकूफी है, जो बैल में भी नहीं पाई जाती।
‘किसान क्या करें’ का संदेश किसान जागरण की गीत का संदेश है जिसे उन्होंने किसान आंदोलन के कुरुक्षेत्र में गाँव-गाँव घूकर व्यापक किसान समुदाय को सुनाया ताकि अर्जुन की तरह भ्रम और मोह छोड़कर संघर्ष में कूद पड़े।